रायपुर में ‘न्याय’ का नया मॉडल! 30 हज़ार की रिश्वत पर सस्पेंशन, नक्सली खुफिया लीक पर संरक्षण?

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छत्तीसगढ़ । रायपुर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में इन दिनों एक सवाल चौक-चौराहों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा है—क्या कानून सबके लिए बराबर है, या कुछ खास अफसरों के लिए अलग तराजू रखा गया है?

चर्चा का केंद्र हैं डीएसपी कल्पना वर्मा। आरोप है कि नक्सलियों से संबंधित बेहद संवेदनशील खुफिया जानकारी लीक हुई, लेकिन न तो निलंबन हुआ, न कोई सार्वजनिक कार्रवाई। इसके उलट, ₹30,000 की रिश्वत के आरोप में एक पुलिस अधिकारी को फौरन सस्पेंड कर दिया गया। संदेश साफ है—अपराध छोटा हो तो बड़ी कार्रवाई, अपराध बड़ा हो तो बड़ी खामोशी।

सीएम हाउस से संरक्षण’ की चर्चा

सामाजिक कार्यकर्ता कुनाल शुक्ला ने अपने फेसबुक वॉल पर जो लिखा, उसने आग में घी डाल दिया। पोस्ट के मुताबिक, रायपुर में चर्चा है कि एक कथित आईपीएस अधिकारी “राहुल भगत” सीएम हाउस में बैठकर डीएसपी कल्पना वर्मा को बचा रहा है। यही वजह बताई जा रही है कि नक्सल खुफिया लीक जैसे संगीन आरोपों के बावजूद कार्रवाई ठंडे बस्ते में है।

यह कोई मामूली आरोप नहीं है। सवाल सीधा है—अगर खुफिया सूचना लीक हुई और दोषी पर हाथ नहीं डाला गया, तो फिर ‘आंतरिक सुरक्षा’ शब्द सिर्फ फाइलों की शोभा क्यों बना हुआ है?

दो अफसर, दो कानून?

एक तरफ कथित तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला, दूसरी तरफ ₹30,000 की रिश्वत। एक पर तत्काल सस्पेंशन, दूसरे पर मौन। क्या यही “सुशासन” है?
क्या खुफिया जानकारी की कीमत ₹30,000 से कम आंकी गई है?
या फिर रैंक और रसूख के हिसाब से अपराध का वजन तय होता है?

सवालों से भागता प्रशासन

अब तक न राज्य सरकार की ओर से, न पुलिस मुख्यालय की तरफ से कोई स्पष्ट जवाब। न खंडन, न जांच की घोषणा। यह चुप्पी खुद एक बयान बन चुकी है। अगर आरोप झूठे हैं, तो सार्वजनिक रूप से सफाई क्यों नहीं? और अगर सच हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं?

गृह मंत्रालय की ओर निगाहें

कुनाल शुक्ला ने साफ लिखा है कि अगर यह सच है, तो देश के गृह मंत्रालय को तत्काल संज्ञान लेना चाहिए। वाजिब मांग है। नक्सलवाद से जूझ रहे राज्य में खुफिया लीक कोई ‘आंतरिक मामला’ नहीं, बल्कि सीधे-सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा का प्रश्न है।

कड़वा सच

रायपुर में अब लोग तंज कस रहे हैं—
“₹30 हज़ार लो तो सस्पेंशन,
खुफिया लीक करो तो प्रमोशन का रास्ता?”

जब तक इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक यह सवाल यूँ ही तैरता रहेगा—
क्या छत्तीसगढ़ में कानून किताबों में है, और संरक्षण सीएम हाउस में?

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