कटघोरा में सरकारी गोदाम में ‘घर बसाया’, बिना टेंडर 8 लाख की मरम्मत! हाउसिंग भत्ता भी ले रहे अधिकारी

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गोदाम के नाम पर भवन लिया, खुद रहने लगे; मरम्मत के नाम पर 8 लाख खर्च, निविदा भी नहीं निकाली

कोरबाकटघोरा। सहायक भूमि संरक्षण अधिकारी कार्यालय, कटघोरा में पदस्थ अधिकारी की करतूतें सरकारी नियम-कायदों की खुली धज्जियां उड़ा रही हैं। इस कार्यालय के भीतर ‘सब गोलमाल है’ जैसी स्थिति बन गई है—जहां गोदाम के नाम पर भवन लिया गया, लेकिन उसमें अधिकारी खुद रहने लगे और मरम्मत के नाम पर लाखों की सरकारी राशि उड़ा दी गई।

छोटे से भवन की मरम्मत में 8 लाख, वह भी बिना निविदा!
जानकारी के अनुसार, सहायक भूमि संरक्षण अधिकारी चित्रांगन ठाकुर ने कृषि उपसंचालक से गोदाम के लिए भवन की मांग की थी। कटघोरा के गार्डन और पानी टंकी के समीप एक खाली भवन को गोदाम उपयोग के लिए स्वीकृत करवा लिया गया। लेकिन उसके बाद उस भवन में स्वयं निवास करने लगे। खास बात यह कि किराए के मकान में रहने की झूठी सूचना देकर शासन से हाउसिंग अलाउंस भी ले रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, बीते 6 माह पूर्व उक्त भवन की मरम्मत के नाम पर बिना किसी टेंडर प्रक्रिया के 8 लाख रुपए से अधिक की राशि खर्च की गई। जबकि भवन की लंबाई-चौड़ाई महज 22×20 फीट है। जानकारों का कहना है कि इतनी राशि में नया भवन भी खड़ा किया जा सकता था।

सरकारी नियमों की खुली अनदेखी
शासकीय नियमों के अनुसार, 50 हजार से अधिक की मरम्मत या निर्माण कार्य हेतु टेंडर निकालना अनिवार्य होता है। लेकिन यहां तो सीधे-सीधे नियमों को ताक पर रख कर, बिना निविदा 8 लाख रुपए खर्च कर दिए गए। यह पूरी प्रक्रिया जांच की मांग करती है।

‘जंगल में मंगल’ और करोड़ों के काम
यह अकेला मामला नहीं है। सहायक भूमि संरक्षण कार्यालय द्वारा प्रतिवर्ष जिले के 5 विकासखंडों में करोड़ों रुपए के भूमि एवं जल संरक्षण के निर्माण कार्य कराए जाते हैं—अधिकतर कार्य जंगली क्षेत्रों में होते हैं। लेकिन न तो इन कार्यों की कोई सार्वजनिक जानकारी होती है और न ही पारदर्शिता। पूछने पर अधिकारी कहते हैं—“शासन से कोई कार्य स्वीकृत नहीं हुआ”, जबकि दस्तावेज़ बताते हैं कि पिछले साल 3 से 5 करोड़ तक के कार्य स्वीकृत हुए थे।

प्रशासन से दूर, भ्रष्टाचार से भरपूर
वर्तमान मामला इस बात का प्रमाण है कि कैसे यह विभागीय अमला शासन-प्रशासन की निगाहों से दूर रहकर भ्रष्टाचार को अंजाम दे रहा है। सवाल यह भी उठता है कि क्या जनप्रतिनिधियों और वरिष्ठ अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं है, या फिर सबकुछ जानबूझकर अनदेखा किया जा रहा है?

 

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