सन् 2022 । रायपुर सेंट्रल जेल की ऊँची दीवारों के बीच खामोशी थी, लेकिन उसी खामोशी के भीतर सत्ता की सबसे बड़ी कहानी लिखी जा रही थी।
छत्तीसगढ़ में पुलिस परिवार आंदोलन उस दौर में अपनी चरम सीमा पर था।
सन् 2021 में जहाँ आंदोलनकारियों की मांग पर दो हजार सहायक आरक्षकों की पदोन्नति सरकार को करनी पड़ी थी,
वहीं 2022 आते–आते सत्ता को यह साफ दिख गया कि —
एक आवाज़ पूरे सिस्टम को चुनौती दे रही है।
और इसलिए निशाना तय हो गया।
रायपुर में एक रात — और ऑपरेशन अंधेरा
9 जनवरी की रात।
मैं रायपुर पहुँचा था, पुलिस परिवार आंदोलन के अगले बड़े प्रदर्शन से ठीक एक दिन पहले।
रहने के लिए एक न्यायिक अधिकारी के स्वतंत्र मकान में ठहरा।
रात ढाई बजे दरवाज़ा टूटा।
15–20 पुलिसकर्मी अंदर घुसे।
कोई सवाल नहीं।
कोई नोटिस नहीं।
बाहर 25–30 पुलिस वाहनों का काफ़िला तैयार था।
आंदोलन से जुड़े साथियों को अलग–अलग गाड़ियों में बाँटा जा रहा था।
संदेश साफ था —
सरकार आंदोलन को शुरू होने से पहले ही कुचलना चाहती थी।
थाने से सीधे सेंट्रल जेल
मुझे अलग थाने में रोक लिया गया।
शाम को मेडिकल हुआ — और रास्ता तय हो गया —
रायपुर सेंट्रल जेल।
गाड़ी के भीतर सन्नाटा, और बाहर सत्ता का अदृश्य दबाव।
“पहचानता हूँ आपको…
यहाँ खेल बड़ा है, बचकर रहिए।”
— जेल अधिकारी ने धीमे स्वर में कहा।
झूठी धाराएँ — और अपराध बनता आंदोलन
मुझ पर धारा 151, 107/16 लगा दी गई।
एक ऐसा खेल जिसमें जनता की आवाज़ को “क़ानून व्यवस्था के लिए खतरा” बना दिया जाता है।
मैं मुस्कुराया।
क्योंकि जब कलम सत्ताओं को चुभती है,
तब आवाज़ को अपराध घोषित करना सत्ता की पुरानी रणनीति है।
रिहाई जिसने पूरा खेल बदल दिया
14 जनवरी को जमानत मिली।
लेकिन बाहर कदम रखते ही पता चला —
अन्य आंदोलनकारियों पर Police Act की धारा 3 लगा दी गई थी।
मुझे भी इसमें शामिल करने की तैयारी थी।
तभी अंतरराष्ट्रीय प्रेस–फ्रीडम संस्था
Committee to Protect Journalists (CPJ)
ने मेरी गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए रिपोर्ट प्रकाशित कर दी।
इसके बाद देश के लगभग सभी प्रमुख अंग्रेज़ी मीडिया में खबर चली।
राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई।
और सरकार को अपना फैसला पलटना पड़ा।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई…
8 अप्रैल 2022 —
सत्ता फिर लौटी।
दरवाज़े फिर खुले।
और मैं…
एक बार फिर जेल की ओर बढ़ा।
क्रमशः…
अगला अध्याय —
अध्याय 5:
“फिर से जेल — जहाँ बंदी नहीं, इंसान मिले”
वर्ष 2022 की दूसरी कैद, जिसने मन को तोड़ा नहीं… बल्कि और मज़बूत किया।







