“धरती की आग का आलम : इथोपिया के विस्फोट से उठी राख भारत तक, इंडोनेशिया बना ज्वालामुखियों का सबसे बड़ा केंद्र”

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यूनानी दार्शनिक हेराक्लिटस का प्रसिद्ध कथन है— “इस संसार में कुछ भी स्थिर नहीं, सब कुछ निरंतर प्रवाह में है।” यह विचार केवल दार्शनिक प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में हमारे भौतिक संसार की सच्चाई भी यही है। हम चाहे एक जगह बैठे हों, फिर भी गति में हैं, क्योंकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और साथ ही अपनी धुरी पर घूम रही है। इसी तरह पृथ्वी का आंतरिक भाग भी हमेशा हलचल से भरा रहता है। बाहरी सतह भले ही शांत दिखती हो, लेकिन भीतर लगातार ऊर्जा और उष्मा का प्रवाह बना रहता है, जिसका परिणाम अक्सर भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट के रूप में सामने आता है।

इथोपिया में बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट

हाल ही में अफ्रीकी देश इथोपिया में एक विशाल ज्वालामुखी विस्फोट हुआ। इस विस्फोट से उठी राख खाड़ी देशों को पार करती हुई भारत तक पहुंच गई और अब वह चीन की ओर बढ़ रही है। ज्वालामुखीय गतिविधियों की इस श्रृंखला ने एक बार फिर दुनिया को याद दिलाया है कि पृथ्वी अंदर से आज भी उतनी ही सक्रिय है जितनी करोड़ों वर्ष पहले थी।

दुनिया का ज्वालामुखी हॉटस्पॉट—इंडोनेशिया

कई देशों में ज्वालामुखीय गतिविधियाँ होती हैं, लेकिन एक ऐसा देश है जहाँ इनका सबसे अधिक खतरा बना रहता है—इंडोनेशिया। इसे ‘ज्वालामुखियों का देश’ कहना गलत नहीं होगा। यहां 130 से अधिक सक्रिय ज्वालामुखी मौजूद हैं। इसके पीछे भौगोलिक कारण जिम्मेदार हैं, क्योंकि इंडोनेशिया ‘रिंग ऑफ फायर’ पर स्थित है।

‘रिंग ऑफ फायर’ प्रशांत महासागर के चारों ओर फैला घोड़े की नाल जैसा बड़ा इलाका है, जहां पृथ्वी की कई टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं। प्लेटों की इसी टक्कर से भूकंप और ज्वालामुखी विस्फोट बार-बार होते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व के करीब 75% ज्वालामुखी और 90% भूकंप इसी क्षेत्र में दर्ज किए जाते हैं। ऐसे में इंडोनेशिया इस भूवैज्ञानिक हलचल का सबसे प्रमुख केंद्र बन जाता है, जहां धरती का स्वरूप अक्सर बदलता रहता है।

इतिहास की सबसे भयावह घटनाएँ

इंडोनेशिया का इतिहास दो विनाशकारी ज्वालामुखी विस्फोटों के बिना अधूरा है—माउंट तंबोरा और क्राकाटोआ।

  • 1815 में माउंट तंबोरा का विस्फोट इतना शक्तिशाली था कि इसने विश्व की जलवायु को बदल दिया। ज्वालामुखी की राख महीनों तक वातावरण में छाई रही, जिससे सूर्य की रोशनी धरती पर पहुंच ही नहीं पाई। कई देशों में “गर्मी के बिना वर्ष” जैसी स्थिति बन गई।
  • 1883 में क्राकाटोआ का विस्फोट इससे भी ज्यादा विनाशकारी सिद्ध हुआ। विशाल धमाके, समुद्री सुनामी और राख के तूफानों ने हजारों लोगों की जान ले ली और पूरा क्षेत्र बर्बादी के अंधकार में डूब गया।

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