भारत में कंप्यूटर विज्ञान शिक्षा को नई पहचान देने वाले प्रोफेसर वैद्येश्वरन राजारमन का शनिवार को निधन हो गया। उन्होंने टाटानगर स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से बढ़ती उम्र से जुड़ी बीमारियों से जूझ रहे थे। प्रो. राजारमन को देश में कंप्यूटर साइंस एजुकेशन के पितामह के रूप में जाना जाता था।
प्रोफेसर राजारमन का देश की तकनीकी दुनिया में योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। उन्होंने 1965 में IIT कानपुर में भारत का पहला औपचारिक कंप्यूटर साइंस प्रोग्राम शुरू कराया, जिसने देश में तकनीकी शिक्षा की दिशा ही बदल दी। इसी के साथ उन्होंने आगे चलकर कंप्यूटर विज्ञान को आम विद्यार्थियों तक पहुंचाने की पहल की, जिसे आगे चलकर भारत की तकनीकी क्रांति की शुरुआत माना गया।
प्रो. राजारमन के शिष्य भी आज भारतीय आईटी उद्योग के बड़े नाम हैं। उनके छात्रों में इंफोसिस के संस्थापक एन. आर. नारायण मूर्ति और TCS के पहले CEO फकीर चंद कोहली जैसे दिग्गज शामिल हैं। नारायण मूर्ति ने उन्हें याद करते हुए कहा कि “वे सिर्फ शिक्षक नहीं, बल्कि हर छात्र का मार्गदर्शन करने वाले संरक्षक थे।”
प्रो. राजारमन 1982 से 1994 तक IISc, बेंगलुरु में सुपरकंप्यूटर शिक्षा और शोध केंद्र (SERC) के अध्यक्ष रहे, जहाँ उन्होंने भारत की सुपरकंप्यूटिंग और पैरेलल कंप्यूटिंग क्षमताओं को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। इसके अलावा वे 1987 में प्रधानमंत्री की विज्ञान सलाहकार परिषद द्वारा गठित एक महत्त्वपूर्ण समिति के अध्यक्ष भी रहे।
उनके योगदान को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1976 में शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और 1998 में पद्म भूषण से सम्मानित किया।










