सक्ति जिले के मालखरौदा विकासखंड के बंदोरा गांव ने आत्मनिर्भरता की जो मिसाल पेश की है, वह पूरे प्रदेश के लिए प्रेरणा बन गई है। गांव के अधिकांश परिवार पीढ़ियों से पैरा (धान का भूसा) से रस्सी बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं। घर बैठे रोजगार मिलने से ग्रामीणों को न तो शहरों की ओर पलायन करना पड़ता है और न ही किसी बाहरी काम पर निर्भर रहना पड़ता है।
गांव की महिलाओं, पुरुषों, युवाओं और बुजुर्गों तक—हर कोई इस पारंपरिक काम में माहिर है। ग्रामीणों का कहना है कि यह कला उनके पूर्वजों से चली आ रही है। पुष्पा बाई और ललिता बाई बताती हैं कि एक परिवार प्रतिदिन करीब 150 से 200 रस्सियां तैयार कर लेता है, जो एक रुपये प्रति रस्सी के हिसाब से बिकती हैं। सौ रस्सियों का सैकड़ा 100 रुपये में बाजार में आसानी से बिक जाता है।
पहले ग्रामीण कांवड़ में रस्सी लेकर आसपास के हाट-बाजारों में बेचने जाते थे, लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अब व्यापारी खुद बंदोरा गांव पहुंचकर रस्सी की खरीदी करते हैं। यही नहीं, छत्तीसगढ़ के साथ-साथ ओड़िशा समेत अन्य राज्यों में भी यहां की रस्सियां सप्लाई की जा रही हैं।
बरसात खत्म होते ही ग्रामीण अगले सीजन की तैयारी के लिए पैरा एकत्र कर रस्सी बनाने का काम शुरू कर देते हैं। लगातार मिलने वाला यह रोजगार अब गांव के लिए वरदान साबित हो रहा है।
बंदोरा गांव न सिर्फ अपनी मेहनत से आत्मनिर्भर बना है, बल्कि पूरे जिले में अपनी अलग पहचान भी बना चुका है। यहां के ग्रामीण साबित कर रहे हैं कि यदि इच्छाशक्ति और हुनर हो तो छोटे से गांव में भी बड़े स्तर पर रोजगार का सृजन किया जा सकता है।








