स्वराज जायसवाल ✍️
लोक संस्कृति से जुड़ी रामलीला अब दर्शकों के अभाव में पड़ रही है फीकी, कलाकार कर रहे जीविका के लिए संघर्ष
सदियों से चलती आ रही रामलीला परंपरा को कलाकार आज भी जीवित रखे हैं, लेकिन बदलते दौर में घट रही है जनभागीदारी
बिलासपुर । रामायण चौक, चांटीडीह।
रामायण चौक स्थित चांटीडीह में रामलीला मंचन का आयोजन इन दिनों सुर्खियों में रहा। आज इसका अंतिम दिन था। यह आयोजन क्षेत्र की पुरानी सांस्कृतिक परंपराओं में से एक है, जो सदियों से चली आ रही है। हर वर्ष की तरह इस वर्ष भी रामलीला के मंचन में भगवान राम के जीवन की विभिन्न कथाओं को कलाकारों ने जीवंत किया।
कलाकारों के संघर्ष की झलक:
रामलीला के इस मंचन में भाग लेने वाले अधिकतर कलाकार पेशेवर नहीं, बल्कि आम जन हैं, जो अपनी जीविका चलाने के लिए इस लोक परंपरा को संजोते हुए नाटक प्रस्तुत करते हैं। अभिनय के जरिए वे न केवल धार्मिक भावनाओं को जीवित रखते हैं, बल्कि इसी से अपनी रोजी-रोटी भी कमाते हैं।
भीड़ की कमी ने किया हताश:
हालांकि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में लोगों के पास अब समय नहीं बचा है कि वे पारंपरिक सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बन सकें। यही कारण है कि इस वर्ष रामलीला देखने आने वाले दर्शकों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। कलाकारों ने इसे लेकर अपनी निराशा जाहिर की और कहा कि अगर यूं ही बेरुखी बनी रही तो आने वाले समय में इस परंपरा को जीवित रखना कठिन हो जाएगा।
संस्कृति बचाने की जरूरत:
आज जब डिजिटल युग में सब कुछ स्क्रीन तक सीमित होता जा रहा है, ऐसे में लोक रंगमंच, लोक नाट्य और धार्मिक आयोजन हमारे समाज की आत्मा को जोड़ते हैं। जरूरत है कि युवा वर्ग इसमें भागीदारी करे, दर्शक अपनी मौजूदगी से कलाकारों का मनोबल बढ़ाएं और सांस्कृतिक विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में सहयोग करें।







