कोरबा पाली : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 24 अप्रैल 2015 को राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस पर कहा था कि महिलाओं को कानून ने समान अधिकार दिए हैं, और जब अधिकार मिले हैं तो उन्हें अवसर भी मिलने चाहिए। उन्होंने सरपंच पति संस्कृति को समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन पाली जनपद पंचायत की वास्तविकता इस अपील के विपरीत है।
पाली जनपद की लगभग 50% ग्राम पंचायतों में महिलाएं सरपंच निर्वाचित हुई हैं। बावजूद इसके, अधिकांश पंचायतों का संचालन उनके पति या रिश्तेदार कर रहे हैं। निर्वाचित महिला सरपंच की भूमिका सिर्फ कागजों पर हस्ताक्षर करने या अंगूठा लगाने तक सीमित रह गई है। कई मामलों में उनके पति फर्जी हस्ताक्षर कर पंचायत संचालन में शामिल हो रहे हैं, जो स्पष्ट रूप से पंचायती राज अधिनियम के तहत दंडनीय अपराध है।
जनपद पंचायत कार्यालय की बैठकों में भी निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों की जगह उनके पति या रिश्तेदार भाग ले रहे हैं। इसका नियंत्रण करने की जिम्मेदारी पंचायत सचिव, बीडीओ और जिला पंचायत के सीईओ की होती है। लेकिन पाली जनपद के सीईओ की निष्क्रियता और उदासीनता के कारण यह अवैध चलन बेरोकटोक जारी है।
भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय ने महिला जनप्रतिनिधियों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए सभी राज्य सरकारों को सख्त निर्देश दिए हैं। इन निर्देशों के अनुसार, किसी भी महिला सरपंच के स्थान पर उनके पति या रिश्तेदारों द्वारा पंचायत कार्य में हस्तक्षेप को सख्त वर्जित किया गया है। इसके उल्लंघन पर संबंधित महिला प्रतिनिधि के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।
राज्य शासन द्वारा सभी जिलों के कलेक्टरों को इस संबंध में स्पष्ट आदेश जारी किए गए हैं। लेकिन पाली में सीईओ द्वारा इस पर कोई ठोस पहल नहीं की गई है। नतीजतन पंचायत भवनों में सरपंच पति ही कुर्सी पर बैठकर निर्णय ले रहे हैं और महिला प्रतिनिधियों की पहचान मात्र औपचारिकता बन कर रह गई है।
यदि इस प्रवृत्ति पर शीघ्र अंकुश नहीं लगाया गया, तो नारी सशक्तिकरण के उद्देश्य को गंभीर क्षति पहुँच सकती है।







