रायपुर। रोज उसी रास्ते से गुजरते हुए दीवार पर टंगी मुकेश की तस्वीर मानो उसकी पीड़ा बयां कर रही हो। उसकी दो आँखें जैसे पूछ रही हों—दिद्दु, कहाँ जा रही हो, बिना मुझसे बात किए? हर बार वह तस्वीर एक टीस छोड़ जाती है। मुकेश, एक भावुक और संवेदनशील पत्रकार, जो बस्तर के आदिवासियों की आवाज बन गया था।
मुतवेंदी की मंगली और मुकेश का दर्द
मुकेश पिछले एक साल से मुतवेंदी की मंगली को नहीं बचा पाने की पीड़ा में डूबा था। वह अक्सर कहता था—”बस्तर के आदिवासियों के हिस्से में संघर्ष और पीड़ा है। यहाँ बारूद, बंदूकें और भूख का जंगल है। सड़कें चौड़ी हो रही हैं, पर शिक्षा और स्वास्थ्य आज भी अधूरी कहानियाँ हैं।” सलवा जुडूम के खौफनाक दिनों ने उसके मन पर गहरा असर छोड़ा था। विस्थापन की पीड़ा ने उसे तोड़ दिया था।
‘बस्तर जंक्शन’ की रिपोर्ट और मंगली की कहानी
मुकेश ने मंगली पर रिपोर्टिंग के दौरान कई बार कहा था—”दी, आप यहाँ की पीड़ा पर एक उपन्यास भी लिखेंगी, तब भी दुःख की गहराई को समेट नहीं पाएँगी।” वह हिड़मा कवासी की आईईडी ब्लास्ट में मौत के कवरेज के दौरान भी फूट-फूटकर रोया था। उसकी आवाज में एक ही सवाल था—”आखिर कब तक बेगुनाहों की मौत पर हम सब चुप रहेंगे?”
संवेदनशीलता और संघर्ष से भरा जीवन
मुकेश की संवेदनशीलता हर छोटी चीज़ में झलकती थी। वह बच्चों के लिए रंग-बिरंगी पेंसिल लाता, ताकि उनका जीवन रंगहीन न रहे। वह जानता था कि दुख का रंग सफेद होता है। उसने अभावों और संघर्षों के बीच एक पत्रकारिता की दुनिया बनाई। बस्तर की धूल भरी पगडंडियों ने उसकी पदचाप को पहचाना। वह उन लोगों के लिए आशा था, जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया ने अनदेखा कर दिया था।
एक अधूरी लॉन्ग ड्राइव और खाली पड़े कॉफी के कप
उस दिन उसका आखिरी फोन आया था—”दी, आज आपका जन्मदिन है, लॉन्ग ड्राइव पर चलते हैं और कॉफी मेरी तरफ से।” उसने अपनी कई बातें साझा कीं, पर यह नहीं बताया कि यह आखिरी मुलाकात होगी। उसी शाम से उसकी कोई खबर नहीं मिली। आज भी वो दो खाली कॉफी के कप उसकी गैरमौजूदगी की कहानी कहते हैं। उसका नंबर आज भी फोन में सुरक्षित है, क्योंकि उसके न होने की कमी इस भीड़भरी दुनिया में गहराई से महसूस होती है।









