सहकारी समिति में 3 हजार बोरी धान घोटाला उजागर, हर वर्ष होती है खानापूर्ति कार्यवाही

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बड़े दोषी बेनकाब होने से बच जाते हैं, यह सिर्फ एक समिति नहीं, छत्तीसगढ़ के लगभग हर जिले की कहानी

सूरजपुर । रामानुजनगर छत्तीसगढ़ में धान खरीदी व्यवस्था एक बार फिर सवालों के घेरे में है। सूरजपुर जिले के रामानुजनगर विकासखंड अंतर्गत सहकारी समिति छिंदिया में लगभग 3 हजार बोरी धान (करीब 1200 क्विंटल) कम पाए जाने का मामला सामने आया है। सरकारी समर्थन मूल्य के अनुसार इस धान की कीमत लगभग 40 लाख रुपये आंकी जा रही है। मामला उजागर होने के बावजूद अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ ठोस कार्रवाई न होना, किसानों के आक्रोश को और भड़का रहा है।

औचक निरीक्षण में खुला घोटाला, कार्रवाई फाइलों में अटकी

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जनवरी माह में किए गए औचक निरीक्षण के दौरान सहकारी समिति छिंदिया में धान की भारी कमी पाई गई। इसके बाद रामानुजनगर तहसीलदार ने जांच रजिस्टर में स्पष्ट रूप से 3 हजार बोरी धान की कमी दर्ज की और संबंधित कर्मचारियों पर कार्रवाई के निर्देश भी दिए। बावजूद इसके, कई महीने बीत जाने के बाद भी न तो एफआईआर दर्ज हुई, न ही कोई प्रभावी विभागीय कार्रवाई सामने आई।

यह अकेला मामला नहीं, पूरे छत्तीसगढ़ का पैटर्न

छत्तीसगढ़ में बीते वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि लगभग हर खरीफ सीजन के बाद किसी न किसी जिले से धान खरीदी में गड़बड़ी, बोरी कम मिलने, वजन में हेराफेरी या फर्जी परिवहन जैसे मामले सामने आते रहे हैं।
• कहीं मामला जांच में दबा दिया जाता है,
• कहीं निचले स्तर के कर्मचारी (चपरासी, कंप्यूटर ऑपरेटर) को निलंबित कर खानापूर्ति कर दी जाती है,
• जबकि प्रबंधक, समिति प्रभारी और बिचौलिया नेटवर्क जांच से बाहर रह जाते हैं।

पहले भी उठ चुके थे सवाल, फिर भी नहीं चेता प्रशासन

ग्रामीणों का कहना है कि यह कोई पहला मामला नहीं है। पिछले वर्ष ग्राम अर्जुनपुर के स्थानीय लोगों द्वारा भी सहकारी समिति छिंदिया में अनियमितताओं को लेकर जिला प्रशासन और विभागीय अधिकारियों को शिकायत दी गई थी। उस समय भी जांच के नाम पर केवल औपचारिकता निभाई गई और अंततः समिति के एक चपरासी को निलंबित कर मामला बंद कर दिया गया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस तरह की खानापूर्ति कार्यवाही से दोषियों के हौसले बढ़ते गए और इस वर्ष और बड़ा घोटाला सामने आया।

जांच के नाम पर लीपापोती का गंभीर आरोप

किसानों और ग्रामीणों का आरोप है कि समिति प्रबंधन और कथित बिचौलियों की मिलीभगत से न केवल किसानों के धान में हेराफेरी की गई, बल्कि सरकारी राजस्व को भी भारी नुकसान पहुंचाया गया। जांच प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा गया, ताकि मामला समय के साथ ठंडा पड़ जाए।

किसान-ग्रामीणों में उबाल

कार्रवाई न होने से किसान और ग्रामीणों में भारी असंतोष है। उनका कहना है कि यदि जल्द ही दोषियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई, एफआईआर और उच्चस्तरीय स्वतंत्र जांच नहीं कराई गई, तो वे आंदोलन और प्रदर्शन के लिए बाध्य होंगे।

प्रशासन की चुप्पी पर सवाल

इतने बड़े आर्थिक घोटाले के बावजूद प्रशासन की चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है—

• क्या दोषियों को राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण प्राप्त है?
• क्या हर साल की तरह यह मामला भी फाइलों में दबा दिया जाएगा?
• और क्या सहकारी समितियों की धान खरीदी व्यवस्था में सुधार केवल कागज़ों तक सीमित रह जाएगी?

अब सबकी निगाहें जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर टिकी हैं कि वह इस गंभीर मामले में वास्तविक दोषियों तक पहुंचेगी, या फिर यह मामला भी छत्तीसगढ़ के धान घोटालों की लंबी सूची में एक और आंकड़ा बनकर रह जाएगा।

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