बिलासपुर। विशेष रिपोर्ट।
एक ही फैसले में दो अहम मामलों पर न्यायालय का रुख स्पष्ट, बिना विभागीय जांच होमगार्ड की बर्खास्तगी भी निरस्त
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने रेलवे भूमि अधिग्रहण के बदले पुनर्वास रोजगार को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि जमीन मालिक के परिवार में यदि किसी सदस्य को अब तक नौकरी नहीं मिली है, तो नाती के रोजगार संबंधी दावे पर भी विचार किया जा सकता है। वहीं, एक अन्य मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सुरक्षा ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप में बर्खास्त होमगार्ड जवान की सेवा समाप्ति को गलत ठहराते हुए बहाली का रास्ता साफ किया है।
रेलवे भूमि अधिग्रहण मामले में नाती के दावे को मिली राहत
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम कोसमंदा का है। यहां महेश राम के नाम दर्ज खसरा नंबर 487/5 की 0.004 हेक्टेयर भूमि रेलवे लाइन विस्तार परियोजना के लिए अधिग्रहित की गई थी।
भूमि अधिग्रहण के बदले महेश राम की बेटी सावित्री बाई ने रोजगार की मांग की, लेकिन आयु सीमा का हवाला देते हुए उनका दावा खारिज कर दिया गया। इसके बाद उनके बेटे सनत कुमार कश्यप ने अपने नाना की अधिग्रहित जमीन के बदले रोजगार की मांग की।
रेलवे ने 2 सितंबर 2011 की नीति का हवाला देते हुए नाती को रोजगार देने का प्रावधान नहीं होने की बात कही और दावा अस्वीकार कर दिया।
केंद्र सरकार की याचिका हाई कोर्ट ने की खारिज
सनत कुमार कश्यप ने केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण, जबलपुर में याचिका दायर की थी। अधिकरण ने 31 जुलाई 2025 को ‘यशवंत मामले’ के आधार पर रोजगार के दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया था।
रेलवे ने अधिकरण के आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी। मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश कृष्ण राम महापात्र और न्यायमूर्ति संतोष शर्मा की पीठ ने की।
पीठ ने अधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए केंद्र सरकार की याचिका निरस्त कर दी। इस फैसले से भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार मांगने वाले परिवारों के लिए महत्वपूर्ण राहत का रास्ता खुला है।
10 साल बाद होमगार्ड को मिलेगी बहाली की राहत
बिलासपुर हाई कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में कांकेर जिले के होमगार्ड जवान गजाधर कुमार नाग की बर्खास्तगी को निरस्त कर दिया।
गजाधर कुमार नाग को वर्ष 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छत्तीसगढ़ प्रवास के दौरान सुरक्षा ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था।
जवान का कहना था कि वह 26 अक्टूबर से 2 नवंबर 2016 तक मलेरिया और टाइफाइड से पीड़ित था। उसे कांकेर के शासकीय कोमल देव जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 2 नवंबर को फिटनेस प्रमाणपत्र भी जारी हुआ था।
बिना विभागीय जांच बर्खास्तगी को कोर्ट ने माना गलत
न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद ने सुनवाई के दौरान पाया कि जवान की सेवा समाप्त करने से पहले न तो कारण बताओ नोटिस दिया गया, न आरोप पत्र जारी किया गया और न ही विभागीय जांच कराई गई।
कोर्ट ने कहा कि जवान को अपना पक्ष रखने का उचित अवसर दिए बिना सेवा समाप्त करना न्यायसंगत नहीं है। जांच नहीं कराने का कोई कारण भी दर्ज नहीं किया गया था।
हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश रद्द करते हुए लागू सेवा नियमों के अधीन बहाली के निर्देश दिए। अनुपस्थिति अवधि के संबंध में चिकित्सा दस्तावेजों और संबंधित नियमों के अनुसार निर्णय लेने की बात कही गई।
दोनों फैसलों को न्यायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ओर रेलवे भूमि अधिग्रहण के बदले रोजगार के दावे पर परिवार के दायरे को लेकर राहत मिली है, वहीं दूसरी ओर बिना उचित प्रक्रिया अपनाए कर्मचारी को सेवा से हटाने के खिलाफ न्यायालय ने स्पष्ट संदेश दिया है।








