छत्तीसगढ़ । विशेष रिपोर्ट।
पत्रकार अलंकरण की गरिमा बचाने की मांग तेज, ग्रामीण और छोटे शहरों के पत्रकारों को समान अवसर देने की उठी आवाज
छत्तीसगढ़ में पत्रकार अलंकरण को लेकर चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले पत्रकारों को सम्मानित करने की इस पहल को लेकर अब यह मांग जोर पकड़ रही है कि अलंकरण का आधार पहुंच, पहचान और सिफारिश नहीं, बल्कि वास्तविक पत्रकारिता और जनहित में किए गए कार्य होने चाहिए।
आखिर सम्मान का हकदार कौन—सत्ता के करीब रहने वाला पत्रकार या जनता की आवाज उठाने वाला पत्रकार?
यह सवाल आज उन पत्रकारों के बीच चर्चा का विषय है, जो गांवों, कस्बों और दूरस्थ क्षेत्रों में सीमित संसाधनों के बावजूद जनता की समस्याओं को लगातार सामने लाते हैं।
जनहित की पत्रकारिता करने वालों को मिले प्राथमिकता
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है। पत्रकार अपनी कलम के माध्यम से उन समस्याओं को सामने लाते हैं, जिन्हें कई बार शासन-प्रशासन तक पहुंचने में लंबा समय लग जाता है।
गांवों की बदहाल सड़कें, अस्पतालों की अव्यवस्था, स्कूलों की समस्याएं, भ्रष्टाचार, गरीबों के अधिकार और आम जनता की पीड़ा को उजागर करना ही पत्रकारिता का वास्तविक उद्देश्य है।
ऐसे पत्रकारों के लिए पत्रकारिता केवल रोजगार नहीं, बल्कि जनसेवा और सामाजिक जिम्मेदारी का माध्यम है।
लेकिन जब पत्रकारों को सम्मानित करने की बात आती है, तो यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वास्तविक योगदान देने वाले पत्रकारों को पीछे न छोड़ दिया जाए।
छोटे शहरों और ग्रामीण पत्रकारों की अनदेखी क्यों?
बस्तर, सरगुजा, बलरामपुर, जशपुर, कोरिया, दंतेवाड़ा सहित प्रदेश के विभिन्न दूरस्थ क्षेत्रों में पत्रकार कठिन परिस्थितियों में काम करते हैं।
न सीमित संसाधनों की परवाह, न सुविधाओं की अपेक्षा—वे लगातार जनता की समस्याओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता का मूल्यांकन केवल बड़े शहरों, बड़े मीडिया संस्थानों और प्रभावशाली पहचान तक सीमित रहना चाहिए?
छोटे समाचार पत्रों, डिजिटल मीडिया और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों को भी समान अवसर मिलना चाहिए। पत्रकारिता का मूल्य संस्थान के आकार से नहीं, बल्कि उसके कार्य, निष्पक्षता और जनहित के प्रति प्रतिबद्धता से तय होना चाहिए।
चयन प्रक्रिया पारदर्शी हो, कथित सेटिंग पर लगे विराम
पत्रकार अलंकरण की प्रतिष्ठा बनाए रखने के लिए चयन प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष बनाना समय की मांग है।
सम्मान के मापदंड सार्वजनिक हों, पत्रकारों के वास्तविक कार्यों का मूल्यांकन किया जाए और जनहित में किए गए योगदान को प्राथमिकता दी जाए।
सम्मान के नाम पर यदि कहीं कथित सिफारिश, पक्षपात या सेटिंग की गुंजाइश बनती है, तो इससे पूरे सम्मान समारोह की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।
पत्रकार अलंकरण किसी की कृपा या उपकार नहीं, बल्कि पत्रकारिता के उत्कृष्ट योगदान का सम्मान होना चाहिए।
अलंकरण बंद हो या व्यवस्था में सुधार?
यह भी विचारणीय है कि यदि सम्मान के योग्य पत्रकारों को उचित अवसर नहीं मिल रहा, तो पत्रकार अलंकरण की वर्तमान व्यवस्था का औचित्य क्या है?
अलंकरण बंद करना समाधान है या चयन प्रक्रिया में व्यापक सुधार करना—इस पर गंभीर विचार और संवाद की आवश्यकता है।
हालांकि, पत्रकारिता के सम्मान को समाप्त करने के बजाय उसे अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाना जरूरी है।
हमारी प्रमुख मांगें
पत्रकार अलंकरण की चयन प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाई जाए।
सम्मान के स्पष्ट मापदंड सार्वजनिक किए जाएं।
जनहित के मुद्दे उठाने वाले पत्रकारों को प्राथमिकता मिले।
ग्रामीण और छोटे शहरों के पत्रकारों को समान अवसर दिया जाए।
छोटे समाचार पत्रों और डिजिटल मीडिया के पत्रकारों के योगदान का उचित मूल्यांकन हो।
चयन प्रक्रिया में कथित सिफारिश और पक्षपात की संभावनाओं को समाप्त किया जाए।
जनता के बीच विश्वसनीयता ही पत्रकार का असली सम्मान
पत्रकार का वास्तविक सम्मान किसी मंच पर मिली ट्रॉफी या प्रशस्ति पत्र तक सीमित नहीं होता। उसकी असली पहचान जनता के बीच उसकी विश्वसनीयता, निर्भीकता और जनहित के प्रति समर्पण से बनती है।
यदि छत्तीसगढ़ में पत्रकार अलंकरण को प्रतिष्ठित और सम्मानजनक बनाना है, तो सम्मान के वास्तविक हकदार पत्रकारों तक उसे पहुंचाना होगा।
सिफारिश नहीं, सच्ची पत्रकारिता को सम्मान मिले।
पत्रकार अलंकरण की गरिमा बचाइए, जनहित के पत्रकारों को उनका अधिकार दिलाइए।








