सांसों में घुल रहा है जहर, फिर भी इंसान मौन- हीरा मोटवानी 

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जिंदा रहने का हक भी छीना जा रहा

रायगढ़। रायगढ़ में प्रदूषण का स्तर इतना बढ़ गया है कि हम अपनी जिंदगी के 10 से 15 वर्ष की कुर्बानी तथाकथित विकास के नाम पर दे रहे हैं। दूसरे शब्दों में हम अपने परिवार के भरण पोषण के लिए मजबूरी वश अपने जीवन की आहुति दे रहे हैं। सैकड़ों वर्षों कि गुलामी के कारण हममें गुलाम मानसिकता इस कदर घर कर गई है की तीन पीढ़ियां जाने के बाद भी हम यह मानते हुए कि अब हमारे कहने से तो कुछ होगा नहीं, कह कर भी क्या फायदा, अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, इन बड़े लोगों से कौन उलझे, पूरा सिस्टम इनके उंगलियों पर नाचता है, आखिर हमारी सुनेगा कौन, अब जो हमारे बच्चों के भाग्य में होगा वही होगा,अध्याय समाप्त कर लेते हैं। 

कुछ जागरूक लोग बीच-बीच में इस मुद्दे को उठाते हैं तो उन्हें राजनीतिक मुद्दा कहकर इग्नोर किया जाता है। जबकि हम सभी जानते हैं कि वह मुद्दा नहीं बल्कि अकाट्य तथ्य है।  रायगढ़ में PM10 यानी हवा में मौजूद 10 माइक्रोमीटर या उस छोटे आकार के ठोस कण धूल, धुआँ और मिट्टी के कणों के रूप में हमारे नाक और गले से होते हुए फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं। वैसे ही PM 2.5 ऐसे छोटे पार्टिकल जो नंगी आंखों से दिखाई नहीं देते जो वाहन और ईंधन तथा उद्योगों में जलने वाले केमिकल से उठे धुएं और गैस के रूप में हमारे शरीर के अंदर सांसों के द्वारा पहुंच रहे हैं। 

N02 यानी नाइट्रोजन डाइऑक्साइड वाहनों और कारखानों से उत्सर्जित गैस और N03 नाइट्रोजन ट्राईऑक्साइड जो अत्यंत ही सूक्ष्म पार्टिकल में हवा से ऊपर जाकर अम्लीय वर्षा के रूप में वापस हम पर ही गिरते हैं।  इन सभी से सांस के रोग, हृदय रोग , कैंसर और त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, खून के थक्के से बनने वाले रोग हमारे शरीर में घर कर रहे हैं । परंतु न तो सिस्टम को इस बात की चिंता है और ना ही लोकतंत्र के किसी स्तम्भ को , सभी ने इसे मानसिक रूप से स्वीकार कर लिया है।  यदि हम देखें की इनका न्यूनतम वार्षिक औसत कितना होना चाहिए तो PM10 का 60 PM2.5 का 40 और N02 का 40 N03 का 40 होना चाहिए।

परंतु रायगढ़ में यह 120 तक है और मिलूपारा ,छाल ,पूंजीपथरा, कुंजेमुरा क्षेत्र में यह 200 और 78 तक है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि PM 2.5,का स्तर  50 तक आ जाए तो बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए ठीक उसी तरह यदि यह 65 होता है तो बुजुर्गों को भी घर के अंदर ही रहना चाहिए लेकिन जिंदगी की जद्दोजहद ने हमें इतना मजबूर कर दिया है कि हम जान हथेली पर लेकर घूम रहे हैं।

और उन बच्चों की भी जान दांव पर लगा रहे हैं जिनके लिए हम यह कहते हैं कि हम उनके भविष्य के लिए कमा रहे हैं। अरे जब बच्चे ही नहीं रहेंगे तो फिर उस पैसे का क्या करोगे आखिर हमारे होंठ क्यों सिल दिए गए, क्यों हम मौन है, क्यों हम अपनी बात नहीं रख पाते हैं, हमारे जनप्रतिनिधि चुप क्यों हैं। जब हम जिंदा ही नहीं रहेंगे तो चौड़ी सड़क, लाइब्रेरी ,वन उपवन, इनका क्या करेंगे।

भाग्य वश हमें जो जनप्रतिनिधि मिले हैं वे तो स्वयं विद्वान है यदि उनके रहते भी इस समस्या का हल नहीं निकलेगा तो फिर कभी नहीं  निकलेगा।आखिर क्यों उनका सिस्टम प्रदूषण फ़ैलाते उद्योगों पर नकेल नहीं कसता । क्या चंद रुपयों की पेनाल्टी लगाने के बाद यह सब सुधर जाएगा ,नहीं ,जब तक इन उद्योगों में ताले नहीं लगेंगे जब तक इन उद्योगों के प्रबंधन को सजा नहीं होगी तब तक इस पर अंकुश लगाना कठिन है।  एक व्यक्ति के हत्या पर 302 का मुकदमा चलाकर उस अपराधी को उम्र कैद या मौत की सजा होती है। 

पर सामूहिक नरसंहार को कोई सजा नहीं।  कितनी बड़ी विडंबना है। आखिर मेरे रायगढ़ का कसूर क्या था केवल इतना ही तो कि हमारी रत्न गर्भा धरती मां अपने अंदर  खनिज भंडार समेटे हुए है।  क्या हम सुरक्षित तरीके से इन प्राकृतिक संसाधनों का दोहन नहीं कर सकते, क्या पैसा कमाना और अमीरों की सूची में अपना नाम दर्ज कराना उन्हें इस नरसंहार की इजाजत देता है।  शायद नहीं, रायगढ़ वासियों  सोचिएगा जरूर अत्यंत ही चिंताजनक स्थिति बनी हुई है।

विपक्ष जितना हो सकता है अपना कर्तव्य पूरा कर रहा है। ऐसे में जनता को भी आगे आना होगा, पहले शासन प्रशासन के साथ बैठ कर इसका हल खोजें, उसके बाद उद्योगपतियों से जाकर बातचीत करें उन्हें आग्रह करें कि वह इंसानियत के नाते प्रदूषण कम करने के उपाय करें। यदि उसके बाद भी कोई हल नहीं निकलता है तो हम न्यायपालिका की शरण में जाएं कहीं से तो हल निकलेगा,कहते हैं न उम्मीद पर दुनिया कायम है।और उम्मीद वर्तमान नेतृत्व से भी है।

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