क्या अमरकंटक में अब कानून नहीं, माफिया की बंदूक चलेगी?
जीपीएम/अमरकंटक |
जब सत्ता खामोश हो जाए और कानून फाइलों की धूल में दब जाए, तब माफिया को खुली छूट मिल जाती है। छत्तीसगढ़–मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित अमरकंटक–मैकल बायोस्फियर रिजर्व, जो कभी हरियाली, नदियों और आस्था की पहचान था, आज अवैध खनन और भय के पर्याय में बदलता जा रहा है।
ताज़ा घटना ने लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा और खौफनाक हमला दर्ज कराया है। अवैध उत्खनन की सच्चाई कैमरे में कैद करने की “जुर्म” में पत्रकार सुशांत गौतम को जानलेवा हमले का शिकार बनाया गया। लोहे की रॉड, तोड़ी गई गाड़ियाँ, बहता खून और मौत की धमकी—यह सिर्फ एक पत्रकार पर नहीं, बल्कि सच बोलने की आज़ादी पर हमला था।
वरिष्ठ पत्रकारों का आक्रोश
“क्या हर बार किसी को लहूलुहान होना पड़ेगा, तभी सरकार जागेगी?”
वरिष्ठ पत्रकार कुमार जितेंद्र ने इस घटना को व्यवस्था के मुँह पर करारा तमाचा बताया। उनका सवाल सीधा है—
“क्या छत्तीसगढ़ में अब माफिया के खिलाफ सच लिखना जानलेवा अपराध बन चुका है? क्या सरकार की चुप्पी मूक सहमति नहीं है?”
उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पत्रकारों को डराकर चुप कराया गया, तो यह सिर्फ मीडिया नहीं, बल्कि आम जनता के सूचना के अधिकार की हत्या होगी।
हमले की पूरी कहानी
जब सड़क बनी युद्धक्षेत्र
8 जनवरी, शाम लगभग 6 बजे।
सुशांत गौतम अपनी टीम के साथ मैकल पर्वत श्रृंखला में हो रहे अवैध उत्खनन की रिकॉर्डिंग कर लौट रहे थे। धनौली क्षेत्र में अचानक माफिया ने चारों ओर से घेराबंदी कर ली—
- सामने सफेद कार
- एक ओर भारी भरकम हाईवा
- पीछे से तीसरा वाहन
पलभर में रास्ता बंद, और फिर हमला शुरू।
लोहे की रॉड से बेरहमी से वार किए गए, गाड़ियों के शीशे चकनाचूर कर दिए गए। साक्ष्य मिटाने की नीयत से मोबाइल फोन लूट लिया गया। यह हमला किसी व्यक्ति पर नहीं, बल्कि उस कैमरे पर था जो माफिया की काली कमाई को उजागर कर रहा था।
नामजद आरोपी, फिर भी निडर
कानून का डर क्यों नहीं?
घटना पर FIR क्रमांक 0014/2026 दर्ज की गई है।
नाम सामने हैं—
- जयप्रकाश शिवदासानी (जेठू)
- सुधीर बाली
- लल्लन तिवारी
भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएँ— 126(2), 296, 115(2), 351(3), 324(4), 304, 3(5)—यह साफ बताती हैं कि हमला योजनाबद्ध और संगठित था।
लेकिन सवाल जस का तस है—
क्या प्रभावशाली आरोपियों तक कानून का हाथ पहुँचेगा, या यह मामला भी बाकी फाइलों की तरह ठंडे बस्ते में चला जाएगा?
प्रशासन की चुप्पी
लापरवाही या मिलीभगत?
मरवाही वनमंडल की रिपोर्ट खुद गवाही देती है कि पमरा क्षेत्र में क्रेशर माफिया खुलेआम नियम तोड़ रहा है—
- बायोस्फियर रिजर्व में भारी मशीनें
- 250 मीटर नियम की धज्जियाँ
- डायनामाइट से पहाड़ों को छलनी किया जा रहा है
यह सब सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद जारी है।
तो सवाल उठना लाज़मी है—
- वन विभाग की चेतावनी के बाद भी खनन क्यों जारी है?
- अनूपपुर खनिज विभाग की कार्रवाई कहाँ है?
- क्या माफिया को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ है?
घायल पत्रकार, अडिग हौसला
“कलम रुकेगी नहीं”
जानलेवा हमले के बावजूद सुशांत गौतम का संकल्प व्यवस्था के लिए सीधी चुनौती है—
“यह हमला उनकी बौखलाहट है। वे सच से डरते हैं। धमकियाँ और झूठे केस कुछ नहीं बदलेंगे। मैकल की बर्बादी का सच सामने आता रहेगा।”
यह बयान बताता है कि शरीर घायल हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता अभी ज़िंदा है।
अब आर-पार की ज़रूरत
वरना मान लिया जाएगा—यहाँ माफिया का शासन है
मैकल पर्वत केवल पत्थरों का ढेर नहीं,
यहीं से नर्मदा, सोन और जोहिला जैसी नदियाँ जन्म लेती हैं,
यह करोड़ों लोगों की आस्था और आने वाली पीढ़ियों की धरोहर है।
आज यदि एक पत्रकार को सरेआम घेरकर पीटा जा सकता है,
तो कल कोई भी आम नागरिक सुरक्षित नहीं रहेगा।
अब वक्त कागजी कार्रवाई का नहीं,
तत्काल गिरफ्तारी, अवैध क्रेशरों पर सख्त कार्रवाई और पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का है।8














