जशपुर/पत्थलगांव। विशेष रिपोर्ट।
पॉक्सो से जमीन विवाद तक गंभीर शिकायतों का अंबार, कार्रवाई की रफ्तार पर उठे सवाल; पीड़ितों को न्याय का इंतजार
क्या पत्थलगांव में कानून का राज है या फिर राजनीतिक रसूख के सामने सिस्टम बेबस नजर आ रहा है? यह सवाल इन दिनों क्षेत्र की सियासत और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच सबसे ज्यादा चर्चा में है।
पॉक्सो एक्ट, एससी/एसटी अत्याचार, महिला के घर में घुसकर कथित मारपीट, जमीन पर कब्जे और नौकरी के नाम पर कथित अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोपों से जुड़े मामलों ने स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि कई बार शिकायत और दस्तावेज प्रशासन तक पहुंचाए जाने के बावजूद अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई।
मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि शिकायतकर्ता पक्ष लगातार थाना, प्रशासन और जनशिकायत तंत्र के दरवाजे खटखटाने का दावा कर रहा है। इसके बावजूद यदि कार्रवाई स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—आखिर किसके दबाव में कार्रवाई की रफ्तार थमी हुई है?
चार साल पुराना पॉक्सो मामला, तारीखों के बीच अटका इंसाफ?
वर्ष 2022 से जुड़े एक मामले में वार्ड क्रमांक 12 के पार्षद एवं भाजपा नेता श्याम नारायण गुप्ता पर आदिवासी नाबालिग से संबंधित गंभीर आरोप लगाए गए हैं। मामला पॉक्सो और एससी/एसटी कानून से जुड़ा बताया जा रहा है।
पीड़ित परिवार का आरोप है कि घटना के बाद से वह लगातार न्याय की प्रक्रिया में संघर्ष कर रहा है। परिवार के अनुसार थाना और न्यायालय के चक्कर लगाते-लगाते लंबा समय गुजर चुका है, लेकिन उन्हें अब भी निर्णायक न्याय का इंतजार है।
शिकायतकर्ता पक्ष ने यह भी आरोप लगाया है कि मामले को लेकर आवाज उठाने पर दबाव और धमकी का सामना करना पड़ा। वहीं, पुलिस कार्रवाई और मामले की वर्तमान न्यायालयीन स्थिति को लेकर स्पष्ट आधिकारिक जानकारी सामने आना बेहद महत्वपूर्ण है।
सवाल यह है कि यदि कानून पीड़ितों की सुरक्षा और त्वरित न्याय के लिए बनाया गया है, तो फिर न्याय की प्रक्रिया इतनी लंबी क्यों खिंच रही है?
एक मामला नहीं, पूरे राजनीतिक नेटवर्क पर उठ रहे सवाल
स्थानीय नागरिकों के आरोपों के मुताबिक मामला किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं है। राजनीतिक और पारिवारिक प्रभाव को लेकर भी क्षेत्र में चर्चाएं तेज हैं।
वार्ड 13 के पार्षद रोशन गुप्ता पर भी सवाल
वार्ड क्रमांक 13 के पार्षद रोशन गुप्ता को लेकर स्थानीय स्तर पर विभिन्न शिकायतों और आरोपों की चर्चा है। नागरिकों का दावा है कि क्षेत्र में कथित प्रभाव के कारण आम लोगों में शिकायत करने को लेकर भी संकोच की स्थिति बनी हुई है।
हालांकि, इन आरोपों की पुष्टि संबंधित आधिकारिक रिकॉर्ड और जांच के निष्कर्षों से होना आवश्यक है।
एल्डरमेन अवधेश गुप्ता का मामला भी चर्चा में
एल्डरमेन अवधेश गुप्ता को लेकर भी एक महिला के घर में घुसकर कथित मारपीट का मामला सामने आने का दावा किया गया है। कथित घटना का वीडियो सामने आने की बात भी कही जा रही है।
यदि शिकायतें और उपलब्ध साक्ष्य सही पाए जाते हैं, तो ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और कानून के मुताबिक कार्रवाई की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है।
CM हेल्पलाइन तक शिकायत, फिर भी निर्माण जारी रहने का आरोप
पत्थलगांव का एक ताजा विवाद बेशकीमती जमीन से जुड़ा बताया जा रहा है। शिकायतकर्ता पक्ष के अनुसार मामले की शिकायत मुख्यमंत्री जनशिकायत हेल्पलाइन 1076 तक की गई।
इसके बावजूद विवादित जमीन पर निर्माण कार्य जारी रहने का आरोप लगाया गया है।
यही नहीं, स्थानीय स्तर पर यह दावा भी किया जा रहा है कि उक्त जमीन का करीब 4 करोड़ रुपये में सौदा किए जाने की तैयारी थी।
यदि यह दावा सही साबित होता है, तो मामला केवल जमीन विवाद तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह प्रशासनिक निगरानी और शिकायत निवारण व्यवस्था की गंभीर परीक्षा भी बन जाएगा।
सवाल सीधा है—जब शिकायत मुख्यमंत्री जनशिकायत तंत्र तक पहुंच चुकी थी, तो मौके पर कार्रवाई की स्थिति क्या रही?
‘खाकी-खादी’ के गठजोड़ की चर्चा, लेकिन सच क्या है
पत्थलगांव में अब सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या राजनीतिक प्रभाव और प्रशासनिक तंत्र के बीच ऐसा कोई समीकरण है, जिसकी वजह से शिकायतों पर कार्रवाई प्रभावित हो रही है?
यह गंभीर सवाल है और इसका जवाब भी उतनी ही गंभीरता से मिलना चाहिए।
यदि आरोप गलत हैं तो संबंधित पक्षों को सामने आकर अपना पक्ष रखना चाहिए। यदि शिकायतों में प्रथम दृष्टया तथ्य हैं तो प्रशासन को निष्पक्ष जांच कर कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए।
क्योंकि लोकतंत्र में चुप्पी हमेशा निर्दोषता का प्रमाण नहीं होती और आरोप हमेशा दोष सिद्ध होने का प्रमाण भी नहीं होते। फैसला जांच और कानून को करना चाहिए।
जनता के पांच सीधे सवाल
पत्थलगांव की जनता अब प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से जानना चाहती है—
1. गंभीर शिकायतों पर अब तक क्या-क्या कार्रवाई की गई?
2. पॉक्सो और एससी/एसटी से जुड़े मामले की वर्तमान जांच एवं न्यायालयीन स्थिति क्या है?
3. जमीन विवाद में शिकायत मिलने के बाद संबंधित विभाग ने मौके पर क्या कार्रवाई की?
4. यदि शिकायतें निराधार हैं, तो प्रशासन जांच रिपोर्ट के माध्यम से स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करता?
5. क्या राजनीतिक या सामाजिक प्रभाव से परे सभी शिकायतकर्ताओं को समान रूप से न्याय और सुरक्षा मिल रही है?
अब जनता को कार्रवाई का इंतजार
पत्थलगांव में उठते सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से नहीं, बल्कि दस्तावेज, जांच और कानून के मुताबिक कार्रवाई से मिलना चाहिए।
किसी व्यक्ति पर आरोप लगना और उसका दोष सिद्ध होना दो अलग-अलग बातें हैं। इसलिए आवश्यक है कि प्रत्येक मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच हो तथा दोषी पाए जाने पर कानून के अनुसार कार्रवाई की जाए।
लेकिन अगर शिकायतें वर्षों तक लंबित रहें, पीड़ित परिवार लगातार दरवाजे खटखटाता रहे और जनशिकायत तंत्र तक पहुंचने के बाद भी जवाब स्पष्ट न हो, तो जनता का सवाल उठना स्वाभाविक है।
पत्थलगांव आज जवाब मांग रहा है—
कानून सबके लिए बराबर है तो कार्रवाई भी बराबर क्यों नहीं दिखती?
क्या सत्ता और रसूख से ऊपर उठकर प्रशासन निष्पक्ष कार्रवाई करेगा?
अब नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर है।






