छत्तीसगढ़ के बालोद जिला न्यायालय में कार्यरत भृत्य राजेश कुमार देशमुख को शादी के लिए ली गई छुट्टी के कारण नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया था। हालांकि, लगभग 9 वर्षों तक चले कानूनी संघर्ष के बाद, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने उन्हें पुनः सेवा में बहाल करने का आदेश दिया है और 50 प्रतिशत पिछला वेतन भी देने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि:
राजेश देशमुख ने 27 अप्रैल से 7 मई 2016 तक शादी के लिए 7 दिनों की अर्जित छुट्टी के लिए आवेदन किया था। हालांकि, उनकी छुट्टी की अर्जी अस्वीकृत कर दी गई थी, और उन्हें केवल 3 दिनों की छुट्टी के लिए अलग से आवेदन करने के लिए कहा गया था। इसके बावजूद, वे 24 अप्रैल से 12 मई 2016 तक अनुपस्थित रहे। उन्हें 27 मई 2016 को एक कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसका उत्तर देते हुए उन्होंने छुट्टी अस्वीकृति की जानकारी न होने का दावा किया और क्षमा याचना की। इसके बावजूद, 22 जून 2016 को उन्हें छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (आचरण) नियमावली, 1965 और छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (सामान्य सेवा शर्तें) नियमावली, 1961 के तहत ‘गंभीर लापरवाही’ के आधार पर बर्खास्त कर दिया गया ।
हाईकोर्ट का निर्णय:
राजेश देशमुख ने इस बर्खास्तगी के खिलाफ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनके वकीलों ने तर्क दिया कि प्रोबेशन अवधि में भी किसी कर्मचारी को बर्खास्त करने से पहले उचित विभागीय जांच आवश्यक है। जस्टिस संजय श्याम अग्रवाल की एकल पीठ ने पाया कि बिना विभागीय जांच के बर्खास्तगी ‘कलंककारी’ है और यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन है। अतः, कोर्ट ने बर्खास्तगी को रद्द करते हुए देशमुख को पुनः सेवा में बहाल करने और यदि कोई नई जांच नहीं की जाती है, तो उन्हें बर्खास्तगी की तारीख से पुनः नियुक्ति तक 50 प्रतिशत पिछला वेतन देने का आदेश दिया ।
यह मामला दर्शाता है कि प्रोबेशन अवधि में भी कर्मचारियों को उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अधिकार प्राप्त है।
बिना विभागीय जांच के बर्खास्तगी ‘कलंककारी’ मानी जाती है और यह न्यायिक सिद्धांतों के विरुद्ध है।
यह निर्णय अन्य कर्मचारियों के लिए एक मिसाल स्थापित करता है कि वे अपने अधिकारों के लिए न्यायालय का सहारा ले सकते हैं।








