पूर्व आईपीएस शिवदीप लांडे ने बनाई ‘हिंद सेना’ पार्टी, बिहार की सभी 243 सीटों पर लड़ेंगे चुनाव

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पटना | राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत करते हुए पूर्व आईपीएस अधिकारी शिवदीप लांडे ने अपनी नई राजनीतिक पार्टी ‘हिंद सेना’ के गठन की घोषणा कर दी है। ईमानदार, सख्त और जनसेवक की छवि रखने वाले लांडे ने सोमवार को पटना में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी।

हिंद सेना’ का उद्देश्य और विचारधारा
शिवदीप लांडे ने कहा कि ‘हिंद सेना’ जातिवाद, भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण की राजनीति के खिलाफ खड़ी होगी और “मानवता, न्याय और सेवा” को अपना मूलमंत्र बनाएगी। पार्टी का उद्देश्य है कि बिहार में एक ऐसा शासन स्थापित किया जाए जो पारदर्शिता, समानता और सामाजिक न्याय पर आधारित हो।

“हमें धर्म, जाति और क्षेत्रीय सीमाओं से ऊपर उठकर केवल इंसानियत के आधार पर राजनीति करनी है,” — शिवदीप लांडे, पार्टी संस्थापक


प्रमुख एजेंडा और नीतियां

जातिवादी और संप्रदायवादी राजनीति का विरोध

युवाओं को नेतृत्व में प्राथमिकता

भ्रष्टाचार-मुक्त और पारदर्शी प्रशासन

शिक्षा, स्वास्थ्य, और बुनियादी ढांचे पर विशेष जोर

ग्रामीण विकास और नागरिक सुविधाओं की मजबूती

बिहार के अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष

बिहार चुनाव 2025: पूरी ताकत से मैदान में उतरने की तैयारी
शिवदीप लांडे ने स्पष्ट किया कि हिंद सेना आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी। स्वयं लांडे पार्टी का चेहरा होंगे और उन्होंने पार्टी के संगठन को एक जनआंदोलन की तरह विकसित करने की बात कही।

जनसंपर्क और संगठन विस्तार
पार्टी गठन से पहले शिवदीप लांडे ने बिहार के अधिकांश जिलों का दौरा कर जनता से सीधा संवाद किया। बेतिया और बगहा को छोड़कर लगभग सभी जिलों में उन्होंने जनसंपर्क अभियान चलाया, जिससे पार्टी को शुरुआती स्तर पर अच्छी प्रतिक्रिया मिल रही है, खासकर युवाओं और महिलाओं के बीच।

राजनीतिक विश्लेषकों की राय
राजनीतिक हलकों में लांडे के इस कदम को काफी गंभीरता से लिया जा रहा है। उनकी व्यक्तिगत छवि, प्रशासनिक अनुभव और जनता के बीच लोकप्रियता को देखते हुए हिंद सेना के प्रदर्शन पर सबकी नजरें टिकी हैं।


पूर्व आईपीएस अधिकारी से राजनेता बने शिवदीप लांडे का यह कदम बिहार की पारंपरिक राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। ‘हिंद सेना’ की नीति, विचारधारा और संगठनात्मक रणनीति उसे एक अलग पहचान दे रही है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जनता इस नए राजनीतिक प्रयोग को किस हद तक समर्थन देती है।

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