कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा। विशेष रिपोर्ट।
कोरबा/पोड़ी उपरोड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस के अवसर पर 17 सितंबर से शुरू किए गए सेवा संकल्प अभियान के तहत शिक्षा रथ के माध्यम से गांव-गांव जाकर लोगों से पुस्तकों का दान लेने और जरूरतमंद बच्चों तक पहुंचाने की पहल की गई। लेकिन इसी अभियान के नाम पर शिक्षकों से कथित तौर पर ₹200-₹200 की राशि लिए जाने का मामला सामने आने के बाद शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े हो गए हैं।
बताया जा रहा है कि पहले पाली ब्लॉक में शिक्षकों से राशि लिए जाने का मामला चर्चा में आया था और अब ऐसा ही मामला पोड़ी उपरोड़ा ब्लॉक में सामने आया है। इस संबंध में सोशल मीडिया पर प्रसारित संदेश को लेकर शिक्षकों के बीच भी चर्चा तेज हो गई है।
व्हाट्सऐप ग्रुप में संदेश से सामने आया मामला
जानकारी के अनुसार, बीईओ कार्यालय के अधीन संचालित संकुलों से जुड़े शिक्षकों के व्हाट्सऐप ग्रुप में एक संदेश प्रसारित हुआ, जिसमें 24 सितंबर 2026 को सेवा संकल्प अभियान के तहत शिक्षा रथ निकलने और इसके लिए प्रत्येक संस्था के प्रत्येक शिक्षक से ₹200 सहयोग राशि देने की बात कही गई थी।
संदेश में कथित तौर पर बताया गया कि इस राशि से गरीब एवं अन्य बच्चों के लिए कॉपी, पानी बोतल, कंपास, टिफिन डिब्बा जैसी सामग्री खरीदकर वितरित की जाएगी। दावा यह भी किया गया कि यह सहयोग राशि ब्लॉक की सभी संस्थाओं द्वारा दी जानी है।
मामला सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि यह राशि शिक्षकों से ली जा रही थी, तो इसके लिए आधिकारिक आदेश किस स्तर से जारी हुआ था?
68 संकुल समन्वयक और करीब 1500 शिक्षक, तो राशि कितनी?
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पोड़ी उपरोड़ा क्षेत्र में करीब 68 संकुल समन्वयक और लगभग 1500 शिक्षक पदस्थ हैं। यदि प्रत्येक शिक्षक से ₹200 की राशि ली गई हो, तो कुल रकम करीब ₹3 लाख तक पहुंच सकती है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि इतनी बड़ी राशि एकत्र की गई है, तो उसका हिसाब-किताब किसके पास है और राशि किस खाते में जमा हुई? क्या इसके लिए रसीद जारी की गई? क्या राशि बैंक अथवा किसी आधिकारिक माध्यम से जमा हुई या नकद/फोन-पे जैसे माध्यम से ली गई?
डीईओ के बयान से और गहराया सवाल
मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात जिला शिक्षा अधिकारी के कथित बयान को लेकर सामने आ रही है। जानकारी के अनुसार डीईओ ने जनसंपर्क के माध्यम से जारी प्रेस विज्ञप्ति में स्पष्ट किया कि शिक्षा दान के लिए ₹200 राशि शिक्षकों से लिए जाने संबंधी कोई आदेश जारी नहीं किया गया है।
यदि विभाग की ओर से ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ, तो फिर शिक्षकों से ₹200 की राशि देने के लिए संदेश किसके निर्देश पर प्रसारित किया गया? यह सवाल अब पूरे मामले का केंद्र बन गया है।
क्या मौखिक निर्देश पर हुई वसूली?
मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि कहीं यह राशि किसी मौखिक निर्देश के आधार पर तो नहीं ली गई? यदि किसी अधिकारी की ओर से लिखित आदेश नहीं था, तो संकुल समन्वयकों द्वारा शिक्षकों से राशि लेने की प्रक्रिया किस आधार पर शुरू की गई?
शिक्षकों के बीच यह चर्चा भी है कि सेवा संकल्प जैसे सामाजिक अभियान के नाम पर यदि सहयोग राशि ली जा रही थी, तो इसकी पूरी प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए थी। राशि किस उद्देश्य से ली गई, कितनी राशि एकत्र हुई और उससे क्या सामग्री खरीदी गई—इन सभी बिंदुओं का स्पष्ट रिकॉर्ड सामने आना जरूरी है।
पाली के बाद पोड़ी उपरोड़ा में भी वही पैटर्न?
मामले को लेकर एक और गंभीर सवाल यह है कि पहले पाली और अब पोड़ी उपरोड़ा में एक जैसे तरीके से ₹200 की राशि लिए जाने की बात क्यों सामने आ रही है?
यदि दोनों स्थानों पर किसी आधिकारिक आदेश के बिना शिक्षकों से समान राशि ली गई है, तो विभागीय स्तर पर इसकी जांच किए जाने की मांग उठना स्वाभाविक है। वहीं यदि दोनों जगह की प्रक्रिया अधिकृत थी, तो संबंधित आदेश और राशि के उपयोग का विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
जांच से ही साफ होगी तस्वीर
यह मामला केवल ₹200 की राशि का नहीं, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा सवाल बन गया है। शिक्षकों से किसी भी प्रकार का आर्थिक सहयोग लिया गया है तो उसकी वैधानिक प्रक्रिया, आदेश, रसीद, कुल संग्रहित राशि और खर्च का पूरा विवरण सामने आना चाहिए।
जरूरत इस बात की है कि जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग मामले को गंभीरता से लेते हुए निष्पक्ष जांच कराए, यह पता लगाए कि राशि किसके निर्देश पर ली गई, कितने शिक्षकों से राशि ली गई, कुल कितनी रकम एकत्र हुई और उसका उपयोग कहां किया गया।
अब निगाहें शिक्षा विभाग की जांच पर टिकी हैं। यदि वसूली बिना किसी लिखित आदेश के हुई है तो जिम्मेदारी तय होना भी जरूरी है, ताकि भविष्य में किसी अभियान या विभागीय कार्यक्रम के नाम पर शिक्षकों से अनधिकृत राशि लेने की स्थिति पैदा न हो।







