भारत और चीन के बीच हाल ही में नई दिल्ली में हुई उच्चस्तरीय बातचीत के दौरान एक अहम सहमति बनी है। विदेश मंत्री वांग यी की भारत यात्रा के दौरान यह निर्णय लिया गया कि दोनों देश सीमा व्यापार को फिर से चालू करेंगे। इसके लिए जिन मार्गों पर सहमति बनी है, उनमें उत्तराखंड का लिपुलेख दर्रा भी शामिल है।
लिपुलेख दर्रा पिथौरागढ़ जिले में स्थित है और यह कैलाश मानसरोवर यात्रा का प्रमुख मार्ग माना जाता है। यह दर्रा भारत, नेपाल और चीन की त्रिसंधि पर बसा हुआ है। यहां से पहले करीब 15 गांव प्रत्यक्ष रूप से व्यापार से जुड़े थे, जबकि मुनस्यारी और पूरे कुमाऊं मंडल के सैकड़ों गांव अप्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते थे। व्यापारी रामनगर, हल्द्वानी और टनकपुर की मंडियों से सामान लेकर तिब्बत तक पहुंचाते थे।
लिपुलेख के अलावा चमोली जिले की माणा और नीति घाटी तथा उत्तरकाशी की नेलांग घाटी भी व्यापार और तीर्थयात्रा के लिए पुराने समय से महत्वपूर्ण मार्ग रहे हैं। माणा गांव, जिसे अब “देश का पहला गांव” घोषित किया गया है, से होकर सीधे तिब्बत के तकलाकोट (पुरांग) तक पहुंचा जा सकता है। इसी तरह नीति दर्रे से गुजरकर व्यापारी गार्टोक और तकलाकोट जैसे तिब्बती केंद्रों तक पहुंचते थे।
धार्मिक दृष्टि से भी ये मार्ग अहम रहे हैं। बदरीनाथ धाम के कपाट खुलने के बाद साधु-संत और श्रद्धालु इन्हीं रास्तों से कैलाश मानसरोवर की यात्रा पर निकलते थे। वहीं, नेलांग घाटी का उपयोग परंपरागत रूप से भोटिया जनजाति व्यापार और आवाजाही के लिए करती रही है।









