छत्तीसगढ़ में DGP चयन पर घमासान: UPSC पैनल, वरिष्ठता और हस्तक्षेप पर उठे गंभीर सवाल

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रायपुर | विशेष रिपोर्ट

 

छत्तीसगढ़ में पुलिस महानिदेशक (DGP) की नियुक्ति को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। यह मामला अब केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजनीतिक और संस्थागत बहस का केंद्र बन चुका है। राज्य सरकार द्वारा वर्ष 2025 में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) को भेजे गए चार वरिष्ठ IPS अधिकारियों के पैनल ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

 

UPSC को भेजा गया पैनल सवालों के घेरे में

सूत्रों के मुताबिक, सरकार ने UPSC को जिन चार नामों का पैनल भेजा, उनमें पवन देव, अरुण देव गौतम, जीपी सिंह और हिमांशु गुप्ता शामिल थे। लेकिन इस सूची को लेकर सबसे बड़ा विवाद वरिष्ठता क्रम को लेकर खड़ा हुआ है।

 

SRP कल्लूरी को बाहर क्यों रखा गया?

प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि वरिष्ठता के आधार पर शिवराम प्रसाद कल्लूरी (SRP Kalluri) का नाम इस पैनल में होना चाहिए था। लेकिन उनकी जगह हिमांशु गुप्ता को शामिल किया गया, जो मूलतः त्रिपुरा कैडर से हैं और वरिष्ठता में अपेक्षाकृत नीचे माने जाते हैं। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठने लगे हैं।

 

हस्तक्षेप के आरोप ने बढ़ाई सियासी गर्मी

इस पूरे मामले में एक और गंभीर आरोप सामने आया है। बताया जा रहा है कि पूर्व मुख्य सचिव अमिताभ जैन, जिन्हें पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल का करीबी माना जाता है, ने इस चयन प्रक्रिया में भूमिका निभाई। आरोप यह भी है कि उनके प्रभाव के चलते UPSC की बैठक प्रभावित हुई, जिसमें पवन देव और जीपी सिंह के नाम सूची से बाहर कर दिए गए। हालांकि, इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।

 

लंबा कार्यकाल और विवादों से जुड़ा नाम

अमिताभ जैन का कार्यकाल राज्य के इतिहास में सबसे लंबा माना जा रहा है। उनके कार्यकाल के दौरान शराब घोटाला, कोल घोटाला, महादेव सट्टा ऐप और DMF फंड जैसे कई बड़े मामले सामने आए। बावजूद इसके, वे बिना किसी कार्रवाई के सेवानिवृत्त हुए और बाद में उन्हें राज्य सूचना आयुक्त नियुक्त किया गया, जिससे सवाल और गहराते हैं।

 

जीपी सिंह: बरी होने के बाद भी बिना पद

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे संवेदनशील पहलू IPS अधिकारी जीपी सिंह का मामला है। पूर्व में लगे आरोपों से न्यायालय द्वारा बरी किए जाने और DG पद पर प्रमोट होने के बावजूद, वे एक वर्ष से अधिक समय से बिना किसी जिम्मेदारी के हैं। यह स्थिति प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

 

खाली पद, अतिरिक्त जिम्मेदारी और नए पैनल का रहस्य

राज्य में एक DG स्तर का पद खाली है, वहीं एक अधिकारी बिना पद के हैं और अरुण देव गौतम के पास कई विभागों की जिम्मेदारी है। इसके बावजूद गृह विभाग द्वारा तीन नए नाम—SRP कल्लूरी, विवेकानंद सिन्हा और प्रदीप गुप्ता—का पैनल भेजा जाना और भी सवाल खड़े करता है।

 

क्या राज्य में DG स्तर के पदों का विस्तार किया जा रहा है? क्या हर संभाग में DG तैनात करने की योजना है? या फिर यह महज प्रशासनिक असंतुलन है?

 

प्रभारी DGP की सक्रियता पर भी सवाल

फरवरी 2025 से अरुण देव गौतम प्रभारी DGP के रूप में कार्यरत हैं। लेकिन जैसे ही उन्हें नियमित DGP बनाए जाने की खबरें सामने आईं, उनके दौरे अचानक तेज हो गए। और जैसे ही प्रक्रिया रुकी, सक्रियता भी कम हो गई। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक गतिविधियां अब खबरों के आधार पर तय हो रही हैं?

 

‘तेजतर्रार DGP’ से परहेज की चर्चा

सूत्रों के अनुसार, राजनीतिक स्तर पर एक सख्त और तेजतर्रार DGP की नियुक्ति को लेकर भी हिचकिचाहट है। माना जा रहा है कि कानून-व्यवस्था चुनावी मुद्दा बन सकती है, इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है।

 

निष्कर्ष: नियम बनाम प्रभाव की जंग

पूरे मामले ने कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं—

• क्या UPSC को भेजा गया पैनल नियमों के अनुरूप था?

• वरिष्ठता की अनदेखी क्यों हुई?

• क्या चयन प्रक्रिया में बाहरी हस्तक्षेप हुआ?

• एक DG बिना पद और नए पैनल—क्या यह प्रशासनिक विरोधाभास नहीं?

 

छत्तीसगढ़ में DGP नियुक्ति अब एक साधारण प्रक्रिया नहीं, बल्कि “वरिष्ठता बनाम चयन” और “प्रक्रिया बनाम प्रभाव” की जंग बन चुकी है।

 

अब पूरे राज्य की नजर इस बात पर टिकी है कि फैसला नियमों के आधार पर होगा या प्रभाव के आधार पर।

 

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