सरकार बदली, पर अफसरशाही जस की तस – जनपद सीईओ ने कलेक्टर के आदेश को बताया ‘उल-जलूल’

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कोरबा पाली। प्रदेश में सत्ता परिवर्तन के बाद भी अधिकारियों की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं दिख रहा। पूर्ववर्ती सरकार में जमकर भ्रष्टाचार और मनमानी के आरोप झेल चुके कई अधिकारी आज भी उसी शैली में कार्य कर रहे हैं। ताजा मामला पाली जनपद पंचायत का है, जहां मुख्य कार्यपालन अधिकारी भूपेंद्र सोनवानी पर कलेक्टर के आदेशों की अवहेलना करने और विकास कार्यों को अनदेखा करने का गंभीर आरोप सरपंच द्वारा लगाया गया है।

सरकार में वाणिज्य, उद्योग व श्रम मंत्री लखनलाल देवांगन के गृह जिले में ही अधिकारियों की यह मनमानी सामने आना कई सवाल खड़े करता है। सरपंच ज्योतिष कुमार कुसरो ने कलेक्टर अजीत वसंत को जनदर्शन में दिए आवेदन में ग्राम बहरीपानी में रिटर्निंग वाल और रमतला में पुलिया निर्माण की मांग की थी। इस पर कलेक्टर ने तत्काल टीएस (तकनीकी स्वीकृति) प्रस्ताव तैयार कर जनपद सीईओ को प्रेषित करने निर्देश दिया था।

लेकिन सीईओ सोनवानी ने फाइल यह कहते हुए लौटा दी कि— “कलेक्टर तो उल-जलूल आदेश देते रहते हैं, जरूरी नहीं हर आदेश का पालन किया जाए।”

सीईओ का यह बयान प्रशासनिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक मूल्यों पर सीधा प्रहार माना जा रहा है। सरपंच ने सीईओ पर जनहित की अनदेखी, तानाशाही रवैये और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए जिला प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की है।

जिला कार्यसमिति सदस्य कीर्ति कश्यप ने भी जताई नाराजगी
सत्तारूढ़ दल के जिला कार्यसमिति सदस्य कीर्ति कश्यप ने भी सीईओ पर भ्रष्टाचार और अफसरशाही का आरोप लगाते हुए चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई, तो जन आंदोलन शुरू किया जाएगा।

जनहित की अनदेखी बनी चिंता का विषय
ग्राम बहरीपानी के निवासियों के लिए स्टापडेम तालाब की मेढ़ ही मुख्य मार्ग है, जिसकी मरम्मत न होने पर बारिश में आवागमन बंद हो सकता है। वहीं रमतला के नाले में पुलिया नहीं बनने से बरसात में ग्रामीणों का जीवन ठप हो जाता है। ऐसे जन आवश्यक कार्यों के टीएस प्रस्ताव को ठुकराना, सिर्फ प्रशासनिक असंवेदनशीलता ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों के साथ सीधा अन्याय है।

प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
पूर्व में भी सीईओ के भ्रष्टाचार की खबरें सामने आ चुकी हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई न होना, कहीं न कहीं उनकी राजनीतिक पकड़ की ओर भी संकेत करता है। सवाल यह भी उठता है कि जब कलेक्टर का आदेश ही अधिकारी नहीं मान रहे, तो शासन व्यवस्था का औचित्य क्या रह जाता है?

अब देखना यह है कि जिला प्रशासन पाली जनपद सीईओ के इस रवैये पर क्या रुख अपनाता है? क्या अफसरशाही पर नकेल कसी जाएगी, या फिर जनता और जनप्रतिनिधियों की आवाज यूं ही अनसुनी रह जाएगी?

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