सरकारी दावा 72 घंटे का, हकीकत 30 दिन की नाकामी: लवन की 11 धान मंडियों में उठाव फेल

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बलौदा बाजार । लवन सेवा सहकारी समिति के अंतर्गत आने वाली 11 धान मंडियों में धान उठाव पूरी तरह ठप है। सरकार और प्रशासन ने किसानों को भरोसा दिलाया था कि धान खरीदी के 72 घंटे के भीतर उठाव हो जाएगा, लेकिन 30 दिन गुजरने के बाद भी धान मंडियों में ज्यों का त्यों पड़ा है। न गाड़ी आई, न मिलर्स पहुंचे और न ही जिम्मेदार अफसरों ने हालात सुधारे।


धान मंडी नहीं, खुले में पड़ा सरकारी अनाज

मंडियों में हालात ऐसे हैं कि धान तिरपालों के सहारे, खुले आसमान के नीचे पड़ा सड़ रहा है। धूप–नमी–ओस से धान की गुणवत्ता पर सीधा असर पड़ रहा है। सवाल यह है कि अगर धान खराब हुआ तो जिम्मेदारी किसकी होगी?


किसान ने धान दिया, पैसा नहीं मिला

धान बेच चुके किसान आज भी भुगतान के लिए भटक रहे हैं। कई किसान ऐसे हैं जिनका पूरा पारिवारिक खर्च, बच्चों की पढ़ाई और कर्ज की किश्तें इसी भुगतान पर टिकी हैं।
किसानों का साफ कहना है—
“सरकार ने धान तो ले लिया, अब पैसा देने में आंख मूंद ली है।”


प्रबंधक फंसे, ऊपर से आदेश–नीचे से संकट

मंडी प्रबंधक दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक तरफ ऊपर से दबाव है, दूसरी तरफ धान सूखने और खराब होने का डर। न परिवहन की व्यवस्था, न भंडारण की जगह और न ही स्पष्ट निर्देश।
अगर नुकसान हुआ तो पहला निशाना मंडी प्रबंधक ही बनेंगे।


72 घंटे का वादा: कागज़ों में सफल, ज़मीन पर फेल

सरकारी फाइलों में धान उठाव “प्रक्रियाधीन” है, लेकिन लवन क्षेत्र की 11 मंडियों में हकीकत ठप पड़ी है।
यह केवल अव्यवस्था नहीं, बल्कि नीति, निगरानी और नीयत — तीनों की विफलता है।


किसान पूछ रहे हैं—अफसर जवाब देंगे?

अब सवाल सिर्फ धान उठाव का नहीं है, सवाल विश्वास का है।
अगर जल्द ही धान नहीं उठा और भुगतान नहीं हुआ, तो किसानों का आक्रोश सड़क पर उतर सकता है।


लवन की धान मंडियों में पसरा यह सन्नाटा आने वाले बड़े संकट का संकेत है।
अब समाधान चाहिए, बयान नहीं।
अगर प्रशासन ने तुरंत हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह मामला बलौदा बाजार की सबसे बड़ी धान खरीदी विफलताओं में दर्ज होगा।


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