पाली/कोरबा। राजकीय संरक्षित घोषित क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण के लिए बने नियमों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। पाली के प्राचीन महादेव शिवमंदिर के निषिद्ध क्षेत्र के भीतर बिना किसी अनुमति के राखड़ डंपिंग का कार्य धड़ल्ले से जारी है। उड़ती राखड़ मंदिर की शिल्पकारी और प्राचीन स्वरूप को नुकसान पहुँचा रही है। इसके बावजूद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) की चुप्पी चिंता का विषय बन गई है।
बिना अनुमति राखड़ डंप से उड़ती धूल कर रही प्राचीन संरचना को नुकसान
पाली का यह प्राचीन महादेव शिवमंदिर, बिलासपुर–कटघोरा मार्ग पर नौकोनिया तालाब के पश्चिमी तट पर स्थित है। नागर शैली में निर्मित यह सप्त रथ मंदिर वाणवंशी प्रथम विक्रमादित्य द्वारा 870–900 ईस्वी के बीच बनवाया गया था। बाद में कल्चुरी वंश के जाजल्देव प्रथम ने इसका जीर्णोद्धार कराया था।
इतिहास बताता है कि मंदिर के निर्माण और संरक्षण में वाणवंशी, सोमवंशी और कल्चुरी राजाओं ने अहम भूमिका निभाई थी। किसी भी कालखंड में मंदिर को नुकसान नहीं पहुँचाया गया, बल्कि इसे विजय और गौरव का प्रतीक माना गया। आज यह स्थल धार्मिक, तीर्थाटन और पर्यटन के एक प्रमुख केंद्र के रूप में स्थापित है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के नियमों के अनुसार, किसी भी संरक्षित स्मारक के 100 मीटर दायरे में निर्माण अथवा निजी कार्य वर्जित है। बावजूद इसके, बीते कुछ दिनों से मंदिर से मात्र 20 मीटर की दूरी पर राखड़ डंपिंग कर निर्माण कार्य कराया जा रहा है, जिससे उड़ती राखड़ मंदिर की दीवारों और मूर्तिकला पर सीधा असर डाल रही है। इससे मंदिर के मूल स्वरूप पर खतरा मंडराने लगा है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के नियमों की खुली अवहेलना, संरक्षण पर संकट
इतिहास से जुड़ी इस धरोहर के अस्तित्व पर संकट के बावजूद विभागीय लापरवाही हैरान कर रही है। स्थानीय पुरातत्व प्रेमियों ने इस मामले पर गहरी नाराजगी व्यक्त करते हुए मांग की है कि अविलंब राखड़ डंपिंग कार्य को रोका जाए और दोषियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए।
पालि शिवमंदिर, जिसे प्रदेश की ऐतिहासिक धरोहरों में उच्च स्थान प्राप्त है, आज संरक्षित क्षेत्र में हो रहे नियम उल्लंघन की वजह से गंभीर संकट में है। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह हजारों वर्षों की सांस्कृतिक विरासत के लिए अपूरणीय क्षति साबित हो सकती है।









