स्वराज जायसवाल की कलम से…..✍🏻
बिलासपुर शहर में अपोलो हॉस्पिटल से लेकर शनिचरी रपटा पुल तक के इलाके में सड़क चौड़ीकरण के नाम पर गरीबों के आशियाने उजाड़ दिए गए। प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए सड़क से 40 फीट दूरी तक जितने भी घर बने थे, उन्हें ध्वस्त कर दिया। इनमें अधिकांश घर निर्धन, लाचार और निहत्थे लोगों के थे, जिनके पास न तो कोई विकल्प था और न ही कोई सुनवाई।
लोगों का कहना है कि इस कार्रवाई से उन्हें ना केवल छत से वंचित होना पड़ा है, बल्कि कई वर्षों की मेहनत से बसाया गया घर, उम्मीदों और यादों के साथ मलबे में तब्दील हो गया। वे बार-बार यही कह रहे हैं –
“हम गरीब हैं, मजबूर हैं, इसलिए शायद हमारी कोई गिनती नहीं… अगर यही कसूर है, तो आओ, अब मेरा घर भी तोड़ दो।”
अब तक न तो किसी तरह की पुनर्वास योजना का ऐलान किया गया है और न ही कोई आर्थिक सहायता या मुआवजा दिया गया है। पीड़ित परिवारों का कहना है कि प्रशासन ने कार्रवाई से पहले कोई ठोस नोटिस या विकल्प नहीं दिया।
यह घटना न सिर्फ गरीबों के दर्द को उजागर करती है, बल्कि इस बात पर भी सवाल उठाती है कि क्या विकास की कीमत सिर्फ गरीबों से वसूली जाएगी? क्या उनकी ज़िंदगियों को यूँ ही अनदेखा किया जाता रहेगा?








