सुमर दास के कलम से…….✍🏻
छत्तीसगढ़ की समृद्ध संस्कृति और परंपराओं में खमरछठ (षष्ठी तिथि) का विशेष महत्व है। इस दिन माताएं और बहनें संतान की लंबी उम्र, सुख और समृद्धि की कामना करते हुए व्रत रखती हैं।
इस अवसर पर घर के आंगन में मिट्टी का छोटा तालाब बनाया जाता है। उसमें खंभा गाड़कर, किनारे कासी के फूल सजाए जाते हैं। पहले समय में यह पूजा तालाब किनारे और आसपास के वृक्षों के बीच की जाती थी। चूंकि छत्तीसगढ़ कृषि प्रधान राज्य है, इसलिए खेती से जुड़ी हर वस्तु पूजनीय मानी जाती है।
पसहर चावल इस पर्व की विशेषता है। यह बिना हल चलाए, बिना जोती हुई भूमि पर अपने आप उगता है। इसलिए इसी चावल को प्रसाद स्वरूप ग्रहण किया जाता है। साथ ही छै प्रकार की भाजी, भैंस का दूध, दही और घी इस व्रत में प्रमुख रूप से उपयोग किए जाते हैं।
कहावत भी प्रसिद्ध है – “छत्तीसगढ़ के भाजी, जेमा भगवान घलव राजी।”
माताएं छै प्रकार की भाजी और पसहर चावल का भोग बनाकर ग्रहण करती हैं। मिट्टी की चूकिया में छ प्रकार के अन्न और महुआ भरा जाता है। महुआ को गुड़ में पका कर खाने की परंपरा भी इस दिन निभाई जाती है।
बरसात के मौसम में स्वास्थ्य की दृष्टि से ये सभी खाद्य पदार्थ अत्यंत लाभकारी माने जाते हैं। मुनगा भाजी पाचनतंत्र को दुरुस्त रखती है और पसहर चावल भी शरीर के लिए गुणकारी होता है।
छत्तीसगढ़ के हर त्योहार और परंपरा के पीछे वैज्ञानिक और स्वास्थ्यवर्धक कारण छिपे हैं। बुजुर्गों की यह ज्ञान-समृद्ध परंपरा आने वाली पीढ़ियों को संस्कारित करने का माध्यम है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी भाषा, संस्कृति और गौरवशाली परंपराओं को संरक्षित रखें ताकि छत्तीसगढ़ की पहचान कभी धुंधली न हो।








