उपराष्ट्रपति पद से धनखड़ का इस्तीफा, बीजेपी की नई रणनीति में पांच राज्यों की चुनावी गणित शामिल

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भारतीय राजनीति में सब कुछ संभव है यहां एक दिन सत्ता के शीर्ष पर बैठा नेता, दूसरे दिन ‘स्वास्थ्य कारणों’ से घर बैठ सकता है। जगदीप धनखड़ का उपराष्ट्रपति पद से अचानक इस्तीफा भी कुछ इसी किस्म का संवैधानिक सरप्राइज़ रहा।

आधिकारिक तौर पर इसकी वजह उनका स्वास्थ्य बताया गया लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे स्वस्थ लोकतंत्र के लिए अस्वस्थ संकेत भी कहा जा रहा है।

धनखड़ जो कभी संसद में ‘लोकतंत्र की रक्षा’ के लिए विपक्ष पर बरसते नहीं थकते थे आज खुद रक्षात्मक मुद्रा में नज़र आए। यह भारतीय राजनीति का ही कमाल है कि जो कभी सत्ता के साथ अटूट दिखे, अब आंशिक सहमति और पूर्ण असहमति की भेंट चढ़ चुके हैं।

‘राजनीतिक शुचिता’ बनाम ‘संगठनिक सुरक्षा’

एनडीए अब नए उपराष्ट्रपति की तलाश में है और तलाश भी ऐसी कि राष्ट्रपति भवन की छाया से ज़्यादा चुनावी मैदान की धूप में तपे नेता पर जा टिके। बीजेपी की यह कोशिश है कि अगला उपराष्ट्रपति न केवल विधायी अनुभव में पका-पकाया हो बल्कि पार्टी लाइन से इधर-उधर भी न हो।

सूत्र बताते हैं कि इस बार सॉफ्ट-स्पोकन और हार्डलाइन सिंक्रनाइज़्ड उम्मीदवार की खोज हो रही है मतलब ऐसा व्यक्ति जो माइक पर मृदुभाषी लगे लेकिन पार्टी की विचारधारा से एक इंच भी न डिगे। धनखड़ शायद इसी कसौटी पर फिट नहीं बैठे।

धनखड़ की बेबाकी, वरदान या वर्जित?

धनखड़ ने जिस तरह उच्च सदन में विपक्ष को व्यवस्था सिखाने की कोशिश की उसने बीजेपी के लिए जितना वाहवाही नहीं उतना सिरदर्द जरूर बढ़ा दिया। उनका कार्यकाल संवैधानिक परंपराओं के रिफ्रेश बटन की तरह था मगर शायद बीजेपी की नजर में यह फैक्ट्री रीसेट जैसा लगने लगा। धनखड़ के अंतिम राजनीतिक पलों में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा को हटाने संबंधी प्रस्ताव को स्वीकार करना शायद उनके पतन की ‘क्लाइमेक्स स्क्रिप्ट’ बन गई। बीजेपी का उच्च नेतृत्व इसे अति आत्मनिर्भरता की भूल मान बैठा।

‘5 राज्य, 1 उपराष्ट्रपति’: चुनावी गुणा-गणित का शुद्धिकरण

ध्यान दें कि यह सिर्फ एक संवैधानिक पद की नियुक्ति नहीं है यह प्री-पोल पॉलिटिकल इंजीनियरिंग का हिस्सा भी है। बिहार, असम, बंगाल, तमिलनाडु और केरल में आगामी चुनावों की आहट एनडीए की रणनीति में शुद्ध राजनीतिक भूगोल जोड़ रही है। माना जा रहा है कि अगला उपराष्ट्रपति इन राज्यों से किसी एक का चेहरा हो सकता है ताकि राज्यसभा में गरिमा और विधानसभा में रणनीति दोनों का संतुलन साधा जा सके।

संभावित नाम, संभावनाओं का खेल

हरिवंश का नाम हवा में तैर रहा है, मगर यह हवा किस दिशा में बह रही है, यह मालूम नहीं। गैर-विवादास्पद और सौम्य मिज़ाज वाले हरिवंश धनखड़-धमाकों के बाद एक पॉलिटिकल एयर प्यूरीफायर जैसे साबित हो सकते हैं। लेकिन जानकार कहते हैं, बीजेपी अपने इनहाउस नेता को तरजीह दे सकती है ताकि कम से कम अगला उपराष्ट्रपति ज़्यादा सवाल न पूछे और अगर पूछे भी तो स्क्रिप्ट देखकर।

मोदी की वापसी और प्रमोद चंद्र मोदी की नियुक्ति – मोदीकृत प्रक्रिया का संकेत?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मालदीव यात्रा से वापसी के बाद इस फैसले को अंतिम रूप देने की संभावना है। पीएम इस वक्त अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नेतृत्व का प्रदर्शन कर रहे हैं जबकि पीसी(प्रमोद चंद्र) मोदी को उपराष्ट्रपति चुनाव का निर्वाचन अधिकारी बनाकर बीजेपी ने इशारा दे दिया है कि अगली पारी मोदी-फॉर्मूला 2.0 के अनुसार खेली जाएगी।

संघीय राजनीति में ‘सामूहिक निर्णय’ का पर्दा, लेकिन पर्दे के पीछे स्क्रिप्ट तैयार

भले ही एनडीए यह दावा करे कि सहयोगी दलों से विमर्श किया जाएगा, परंतु राजनीतिक जानकार इसे ‘सूचना दी जाएगी, पर अनुमति नहीं ली जाएगी’ रणनीति कहते हैं। सहयोगी दल बस यही देखेंगे कि उनके समर्थन की गिनती ठीक बैठ रही है, बाक़ी कहानी कमल की पंखुड़ियों में ही लिखी जा चुकी है।

धनखड़ गए, लेकिन उनके ‘धनखड़ क्षण’ रहेंगे

राजनीति में जब कोई अप्रत्याशित होता है, तो समझना चाहिए कि उसमें कुछ प्रत्याशित कारण जरूर रहे होंगे। जगदीप धनखड़ का इस्तीफा उसी हाई वोल्टेज ड्रामा का हिस्सा है, जिसमें स्क्रिप्ट पहले ही तैयार थी बस वक्त आने पर इंटरवल घोषित कर दिया गया। अब देखना ये है कि अगले उपराष्ट्रपति के रूप में एनडीए डायलॉगबाज़ नेता लाता है या फिर कोई मौन नायक, जो मंच पर कम दिखे लेकिन हर पंक्ति पार्टी के सुर में बोले।

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