भारत का तिरंगा : आज़ादी और एकता का प्रतीक

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भारत का तिरंगा झंडा न सिर्फ आज़ादी का प्रतीक है, बल्कि यह देश की एकता, अखंडता और गौरव का भी प्रतिनिधित्व करता है। इसके इतिहास में स्वतंत्रता संग्राम की कहानियां और राष्ट्रीय एकता की झलक मिलती है।

तिरंगे का इतिहास
भारतीय राष्ट्रीय ध्वज कई चरणों से गुजरते हुए वर्तमान स्वरूप में पहुंचा। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अलग-अलग संगठनों ने अपने-अपने झंडे अपनाए, लेकिन आज का तिरंगा एक लंबी प्रक्रिया का परिणाम है।

  • पहला राष्ट्रीय ध्वज (1906) : 7 अगस्त 1906 को कोलकाता के पारसी बागान चौक में सबसे पहला झंडा फहराया गया। इसमें हरी, पीली और लाल पट्टियां थीं और उस पर “वंदे मातरम” लिखा था। इसे “कलकत्ता फ्लैग” या “लोटस फ्लैग” भी कहा गया।
  • दूसरा राष्ट्रीय ध्वज (1917) : होम रूल आंदोलन के दौरान एनी बेसेंट और लोकमान्य तिलक ने एक झंडा अपनाया, जिसमें लाल और हरी पट्टियों के साथ चंद्रमा और तारा बने थे।
  • तिरंगे का पहला संस्करण (1921) : विजयवाड़ा में पिंगली वेंकैया ने महात्मा गांधी को झंडे का डिज़ाइन दिखाया, जिसमें लाल, हरा और सफेद रंग था। गांधी जी के सुझाव पर इसमें चरखा जोड़ा गया, जो स्वदेशी आंदोलन का प्रतीक था।

आज़ादी के बाद का बदलाव
15 अगस्त 1947 को भारत के स्वतंत्र होने के बाद झंडे में बड़ा बदलाव किया गया। चरखे की जगह अशोक चक्र को शामिल किया गया, जो प्रगति और न्याय का प्रतीक है। इसी के साथ वर्तमान तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज बना।

सबसे पहले तिरंगा फहराने वाला
भारत का तिरंगा पहली बार 15 अगस्त 1947 को लाल किले पर देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने फहराया। इससे पहले, 22 जुलाई 1947 को संविधान सभा ने तिरंगे को आधिकारिक रूप से भारत का राष्ट्रीय ध्वज घोषित कर दिया था। यह दिन आज “झंडा दिवस” के रूप में याद किया जाता है।

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