बिलासपुर शहर में कंपनी गार्डन के पास, प्रेस क्लब के सामने रोजाना शाम को एक अनोखा नज़ारा देखने को मिलता है।
यहां 8 साल के बच्चों से लेकर 82 साल के बुजुर्गों तक अपनी शतरंज की चालें चलने पहुंचते हैं।
दो दशकों से बना पारिवारिक स्थल
पिछले 20 वर्षों से यह जगह शतरंज प्रेमियों के लिए एक पारिवारिक मिलन स्थल बन चुकी है।
खिलाड़ी यहां केवल खेल नहीं खेलते, बल्कि आपसी सीख, अनुभव और सौहार्द भी बांटते हैं।
इसी कारण इसे स्थानीय लोग प्यार से ‘बिलासपुर का शतरंज चौक’ कहते हैं।
सीनियर खिलाड़ी राकेश शर्मा ने लोकल 18 को बताया:
“यह जगह पिछले 20 साल से शतरंज प्रेमियों के लिए बनी हुई है। जब कोई खिलाड़ी समय पर नहीं पहुंचता, तो उन्हें फोन करके या किसी के माध्यम से बुलाया जाता है। सभी खिलाड़ी एक परिवार की तरह जुड़े हुए हैं। शतरंज खेलना दिमाग को तेज और स्वास्थ्य को संतुलित रखता है।”
हर उम्र के खिलाड़ी, हर चाल का नया अनुभव
राकेश शर्मा के मुताबिक:
- यहां रोजाना 8 साल के बच्चे से लेकर 82 साल के बुजुर्ग आते हैं।
- खिलाड़ी सफेद और काली गोटी की तरह, जीत-हार से परे, खेल की सीख और मैत्री का भाव अपनाते हैं।
शतरंज चौक न केवल खेल का मैदान है, बल्कि समझ, धैर्य और समाजिक मेलजोल का भी केंद्र बन गया है।
खेल और जीवन का संगम
स्थानीय लोग कहते हैं कि शतरंज चौक बच्चों को सहनशीलता और निर्णय लेने की क्षमता सिखाता है।
वृद्ध खिलाड़ी यहां युवा पीढ़ी को अनुभव और रणनीति साझा करते हैं।
इस तरह, बिलासपुर का यह शतरंज चौक सिर्फ खेल का स्थल नहीं, बल्कि सभी उम्र के लोगों के लिए ज्ञान, मित्रता और सामुदायिक जुड़ाव का प्रतीक बन चुका है।










