बिलासपुर। स्वराज जयसवाल की विशेष रिपोर्ट।
बिलासपुर। राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन और कथित पुलिस कार्रवाई के विरोध की गूंज अब छत्तीसगढ़ के बिलासपुर तक पहुंच गई है। मंगलवार को बड़ी संख्या में छात्र कलेक्टर कार्यालय के बाहर एकत्र हुए और सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करते हुए शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता तथा छात्रों की मांगों पर गंभीरता से विचार करने की मांग की।

प्रदर्शनकारियों का कहना था कि लोकतंत्र में अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रखना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है। उनका आरोप है कि छात्रों की समस्याओं का समाधान करने के बजाय उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने सरकार से निष्पक्ष जांच और शिक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार लागू करने की मांग की।

क्या है जंतर-मंतर?
नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर का निर्माण 18वीं शताब्दी में महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने खगोलीय गणनाओं और समय मापन के उद्देश्य से कराया था। समय के साथ यह स्थान देश में लोकतांत्रिक विरोध-प्रदर्शनों का प्रमुख केंद्र बन गया। वर्षों से विभिन्न सामाजिक, छात्र, कर्मचारी और जनसंगठन अपनी मांगों को लेकर यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शन करते रहे हैं।

दिल्ली से बिलासपुर तक विरोध की गूंज
हाल के दिनों में परीक्षा प्रणाली में कथित गड़बड़ियों और अन्य मुद्दों को लेकर जंतर-मंतर पर हजारों छात्रों ने प्रदर्शन किया। इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव की स्थिति भी बनी। कुछ रिपोर्टों में बल प्रयोग के आरोप लगाए गए, जबकि दिल्ली पुलिस ने कहा कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक और सीमित बल का इस्तेमाल किया गया।

इसी घटनाक्रम के विरोध में बिलासपुर में छात्रों ने कलेक्टर कार्यालय के बाहर धरना-प्रदर्शन कर अपनी एकजुटता दिखाई। प्रदर्शनकारियों ने कहा कि छात्रों की आवाज़ को दबाने के बजाय सरकार को उनकी समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए और शिक्षा व्यवस्था को निष्पक्ष, पारदर्शी एवं जवाबदेह बनाना चाहिए।
लोकतंत्र की आवाज़ बना जंतर-मंतर
जंतर-मंतर आज केवल एक ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों, जनभागीदारी और शांतिपूर्ण विरोध का राष्ट्रीय प्रतीक बन चुका है। बिलासपुर का यह प्रदर्शन भी इसी संदेश के साथ आयोजित किया गया कि लोकतंत्र में संवाद और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए।









