बिलासपुर, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रॉपिक सब्सटेंसेस एक्ट, 1985 (NDPS Act) से संबंधित एक अहम निर्णय सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यदि आरोपी के कब्जे से मादक पदार्थ की बरामदगी साबित होती है, तो मात्र प्रक्रियात्मक त्रुटियों के आधार पर उसे बरी नहीं किया जा सकता।
मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा एवं न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु की खंडपीठ ने यह फैसला क्रिमिनल अपील क्रमांक 383/2024 (मो. कालूत मंसुली बनाम छत्तीसगढ़ राज्य) एवं क्रिमिनल अपील क्रमांक 358/2024 (महेश कुमार पासवान बनाम छत्तीसगढ़ राज्य) की संयुक्त सुनवाई के दौरान सुनाया।
🔹 क्या था मामला?
10 सितंबर 2020 को थाना कोमाखान के निरीक्षक प्रदीप मिन्ज को सूचना मिली कि उड़ीसा से बिहार अवैध रूप से गांजा तस्करी की जा रही है। इस सूचना के आधार पर टेमरी फॉरेस्ट बैरियर पर ट्रक को रोका गया, जिसमें दो व्यक्ति – मो. कालूत मंसुली और महेश कुमार पासवान सवार थे।
पुलिस ने ट्रक से 913 किलो गांजा बरामद किया, जिसे 183 पैकेटों में 34 बोरियों के भीतर छुपाकर रखा गया था। मौके पर ही 100-100 ग्राम के नमूने लिए गए तथा शेष सामग्री को जब्त किया गया। फॉरेंसिक जांच में यह गांजा सिद्ध हुआ।
विशेष न्यायालय (NDPS) महासमुंद ने दिनांक 11 जनवरी 2024 को दोनों आरोपियों को 20 वर्ष कठोर कारावास एवं ₹2 लाख का जुर्माना (अदा नहीं करने पर 1 वर्ष अतिरिक्त सजा) की सजा सुनाई थी। इस निर्णय के विरुद्ध दोनों ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की थी।
🔹 हाईकोर्ट का फैसला
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि NDPS एक्ट की धारा 52-A के तहत निर्धारित प्रक्रिया में यदि कुछ कमियां रही भी हों, लेकिन यदि अभियोजन के साक्ष्य यह प्रमाणित करते हैं कि आरोपी के कब्जे से मादक पदार्थ बरामद हुआ है, तो केवल प्रक्रिया की त्रुटि के आधार पर आरोपी को दोषमुक्त नहीं किया जा सकता।
अंततः, उच्च न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश के निर्णय को सही ठहराते हुए दोनों अपीलों को खारिज कर दिया।







