भारतीय सेना ने आज राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर ऑपरेशन पवन में शहीद हुए 1,171 सैनिकों को औपचारिक श्रद्धांजलि अर्पित कर उस ऐतिहासिक विदेशी सैन्य अभियान को पहली बार राष्ट्रीय मान्यता प्रदान की। सेना प्रमुख जनरल उपेन्द्र द्विवेदी और उप सेना प्रमुख लेफ्टिनेंट जनरल पुष्पेन्द्र सिंह ने शहीदों को नमन किया। यह श्रद्धांजलि केवल एक सैन्य परंपरा नहीं, बल्कि उन वीर सपूतों के प्रति राष्ट्र के नैतिक दायित्व का प्रतीक बनी, जिनके बलिदान को 1987 से उचित मान्यता की प्रतीक्षा थी।
इस अवसर पर भारत ने फ्रांस के साथ ‘हैमर’ प्रिसिशन म्यूनिशन के घरेलू निर्माण और फ्रांसीसी-जर्मन रक्षा समूह के साथ 155 मिमी ‘कटाना’ प्रिसिशन आर्टिलरी गोला-बारूद के लिए महत्वपूर्ण रक्षा समझौते भी किए। यह साझेदारियाँ भारतीय सैन्य शक्ति को आधुनिक और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही हैं।
इसी बीच महू में आयोजित उच्च स्तरीय रणनीति संगोष्ठी में सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि भविष्य के युद्धों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। साइबर स्पेस, अंतरिक्ष, ड्रोन और एआई-आधारित तकनीकें आने वाले संघर्षों के मुख्य आधार होंगी, और भारतीय सेना इन चुनौतियों के लिए पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ रही है।
ऑपरेशन पवन: कठिनतम गोरिल्ला युद्ध का इतिहास
अक्टूबर 1987 में श्रीलंका के भीषण संघर्ष के बीच भारतीय सेना को शांति स्थापना के उद्देश्य से भेजा गया था। एलटीटीई की गोरिल्ला रणनीतियाँ, अत्याधुनिक हथियार, आत्मघाती दस्ते और जंगलों- दलदली क्षेत्रों का भौगोलिक दबाव इस अभियान को अत्यंत कठिन बनाते थे। इसी दौरान 1,171 भारतीय सैनिकों ने सर्वोच्च बलिदान दिया, जबकि 3,500 से अधिक घायल हुए।
मेजर रामास्वामी परमेश्वरन ने अपने अदम्य साहस से छह आतंकियों को मार गिराकर परमवीर चक्र प्राप्त किया। 98 वीर चक्र, 25 शौर्य चक्र और सैकड़ों अन्य वीरता अलंकरणों ने सिद्ध किया कि भारतीय सैनिक किसी भी परिस्थिति में अदम्य साहस दिखा सकते हैं।
दशकों तक ‘भूला हुआ युद्ध’ कहे जाने वाले ऑपरेशन पवन को आज पहली बार आधिकारिक रूप से वह सम्मान मिला, जिसके उसके वीर नायक सच्चे अधिकारी थे। यह राष्ट्र की ओर से दिया गया एक स्पष्ट संदेश है—भारतीय सैनिक का बलिदान कभी भुलाया नहीं जाएगा, चाहे वह सीमा पर हो या किसी विदेशी भूमि पर।










