उप संचालक कृषि ने की वैज्ञानिक खेती और विविध फसलों को अपनाने की सलाह
बिलासपुर। जिले में मानसून सक्रिय हो चुका है और सभी क्षेत्रों में लगातार मध्यम वर्षा हो रही है। मौसम विभाग द्वारा इस वर्ष अच्छी बारिश की संभावना जताई गई है। इसी के मद्देनजर जिले के किसान भाई खेती-किसानी के कार्यों में जुट गए हैं और बीज, उर्वरक जैसी कृषि सामग्रियों की व्यवस्था में लगे हुए हैं।
उप संचालक कृषि श्री पी.डी. हथेश्वर ने जानकारी दी कि जिले की 114 सहकारी समितियों में अब तक 19,736 क्विंटल बीज का भंडारण हो चुका है, जबकि 17,575 क्विंटल बीज का उठाव किसानों द्वारा किया जा चुका है। किसानों से अपील की गई है कि नकली बीजों से सतर्क रहें और केवल सेवा सहकारी समितियों या अधिकृत कृषि केंद्रों से ही प्रमाणित बीज और उर्वरक प्राप्त करें।
धान किस्म में करें बदलाव
उन्होंने बताया कि किसानों को परंपरागत किस्म स्वर्णा के स्थान पर अधिक उत्पादन देने वाली एम.टी.यू. 1318 एवं सी.जी. सोनागाठी म्यूटेन्ट जैसे विकल्पों को अपनाना चाहिए, जिनमें रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। लगातार स्वर्णा की खेती से कीट-रोग का खतरा बढ़ता है।
उर्वरक उपयोग में वैज्ञानिक संतुलन जरूरी
उप संचालक ने किसानों से अपील की कि डी.ए.पी. के अत्यधिक उपयोग से बचें, क्योंकि इससे मिट्टी की अम्लीयता बढ़ती है और उत्पादन क्षमता घटती है। इसकी जगह एस.एस.पी., एम.ओ.पी. और एन.पी.के. जैसे उर्वरकों का संतुलित प्रयोग करें, जिससे न सिर्फ उत्पादन बेहतर होगा, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी बनी रहेगी।
सुझाए गए उर्वरक अनुपात (प्रति एकड़)
शीघ्र पकने वाली व देशी किस्में:
यूरिया – 52 किग्रा, सुपरफॉस्फेट – 100 किग्रा, पोटाश – 13 किग्रा
मध्यम अवधि की किस्में:
यूरिया – 87 किग्रा, सुपरफॉस्फेट – 150 किग्रा, पोटाश – 27 किग्रा
उर्वरकों का वितरण स्थिति
114 समितियों में अब तक:
यूरिया: 12,403 मी.टन (वितरण – 8,607 मी.टन)
डी.ए.पी.: 3,375 मी.टन (वितरण – 2,794 मी.टन)
एम.ओ.पी.: 839 मी.टन (वितरण – 505 मी.टन)
एस.एस.पी.: 3,956 मी.टन (वितरण – 2,252 मी.टन)
एन.पी.के.: 1,450 मी.टन (वितरण – 1,020 मी.टन)
वैकल्पिक फसलों की खेती को बढ़ावा
श्री हथेश्वर ने किसानों से अपील की है कि जहां जलभराव कम हो या सिंचाई सुविधा उपलब्ध न हो, उन खेतों में धान के स्थान पर मक्का, अरहर, उड़द, मूंग, मूंगफली, तिल और सोयाबीन जैसी फसलें अपनाएं। इससे एक ओर आय में वृद्धि होगी, वहीं लगातार धान की खेती से मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति और बढ़ती लागत से भी बचाव होगा।








