बिलासपुर/स्वराज जयसवाल की विशेष रिपोर्ट।
सनातन परंपरा की अमूल्य धरोहर बना वट सावित्री व्रत, सुहागिन महिलाओं ने पति की दीर्घायु, परिवार की सुख-समृद्धि और संस्कृति की रक्षा का लिया संकल्प
बिलासपुर/16 मई 2026: भारत की सनातन संस्कृति केवल त्योहारों और परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परिवार, संस्कार, श्रद्धा, त्याग और रिश्तों की गहराई का जीवंत प्रतीक भी है। इन्हीं महान परंपराओं में से एक है वट सावित्री व्रत, जिसे हिंदू धर्म में सुहागिन महिलाओं के सबसे पवित्र और श्रद्धापूर्ण व्रतों में गिना जाता है। ज्येष्ठ अमावस्या के शुभ अवसर पर मनाया जाने वाला यह पर्व भारतीय नारी के समर्पण, आस्था, धैर्य और पतिव्रता धर्म की अद्भुत मिसाल प्रस्तुत करता है।

इस पावन अवसर पर शहर से लेकर गांव तक श्रद्धा और भक्ति का अनुपम वातावरण देखने को मिला। सुबह से ही महिलाएं पारंपरिक परिधानों, सोलह श्रृंगार और धार्मिक उत्साह के साथ वट वृक्ष (बरगद) के नीचे एकत्रित हुईं। हाथों में पूजा की थाली, माथे पर सिंदूर, मांग में सुहाग का प्रतीक और चेहरे पर आस्था की चमक — यह दृश्य भारतीय संस्कृति की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत कर रहा था।

महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर वट वृक्ष की परिक्रमा की तथा कच्चा सूत बांधकर अपने पति की लंबी आयु, उत्तम स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। कई महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर अपने अटूट विश्वास और समर्पण का परिचय दिया। पूजा के दौरान सावित्री-सत्यवान की पौराणिक कथा का श्रवण किया गया, जिसने भारतीय नारी शक्ति और दृढ़ संकल्प की प्रेरणादायक मिसाल को पुनः जीवंत कर दिया।
सावित्री-सत्यवान की कथा : नारी शक्ति और अटूट विश्वास का प्रतीक
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता सावित्री ने अपने तप, बुद्धिमत्ता, साहस और पतिव्रता धर्म के बल पर यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे। यह कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में नारी की शक्ति, समर्पण और आत्मविश्वास का दिव्य संदेश भी है। यही कारण है कि आज भी महिलाएं इस व्रत को पूर्ण श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाती हैं।
वट वृक्ष का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व
वट अर्थात बरगद का वृक्ष भारतीय संस्कृति में अमरता, स्थिरता, दीर्घायु और जीवन शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसकी विशाल शाखाएं और दूर तक फैलती जड़ें परिवार की मजबूती, एकता और निरंतर बढ़ते जीवन का संदेश देती हैं। सनातन धर्म में प्रकृति और वृक्षों की पूजा की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जो पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना को भी दर्शाती है।
संस्कृति से जुड़ाव का संदेश
आधुनिकता और भागदौड़ भरे जीवन के बीच वट सावित्री व्रत जैसे पर्व भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, संस्कारों और परंपराओं से जोड़ने का माध्यम भी है। महिलाओं ने इस अवसर पर समाज में परिवार की एकता, आपसी प्रेम और सांस्कृतिक मूल्यों को बनाए रखने का संदेश दिया।
पूरे क्षेत्र में मंदिरों और पूजा स्थलों पर विशेष धार्मिक आयोजन किए गए। महिलाओं ने भक्ति भाव से पूजा कर परिवार, समाज और देश की खुशहाली की मंगलकामना की। वट सावित्री व्रत ने एक बार फिर भारतीय संस्कृति की उस दिव्य पहचान को जीवंत किया, जहां रिश्तों में प्रेम, विश्वास और समर्पण सर्वोपरि माना जाता है।










