महुआ की कीमत: परंपरा, आजीविका और बाघों का खतरा

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मध्यप्रदेश के उमरिया जिले में स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व इन दिनों बाघों की बढ़ती गतिविधियों और उनसे जुड़ीं आदिवासियों की मौतों को लेकर सुर्खियों में है। बीते डेढ़ महीने में यहां चार आदिवासी बाघों के हमले में जान गंवा चुके हैं। वहीं बालाघाट जिले में भी पिछले 15 दिनों में दो लोग बाघ का शिकार बन चुके हैं। इन घटनाओं ने आदिवासी समाज की पारंपरिक जीवनशैली और वन्यजीवों के बीच टकराव की गंभीरता को उजागर कर दिया है।

जंगल से जुड़ी जिंदगियां

महुआ, जो आदिवासियों के लिए सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, आस्था और आजीविका का हिस्सा है, वही अब मौत का सबब बनता जा रहा है। हर साल मार्च से मई तक महुआ बीनने का सीजन चलता है। सूरज उगने से पहले ही आदिवासी बांस की टोकरियों के साथ जंगल की ओर निकल पड़ते हैं। इन महीनों में शादी-ब्याह, सामाजिक आयोजन तक टाल दिए जाते हैं। महुआ के फूलों से शराब, लड्डू, अचार और बिस्किट बनते हैं। इसके फल से तेल निकाला जाता है, जो भोजन से लेकर औषधीय उपयोग तक में आता है।

परंपरा की कीमत

महुआ बीनते समय जब लोग जमीन पर झुकते हैं, तो बाघ उन्हें चौपाया जानवर समझकर हमला कर देते हैं। वन विभाग ने चेतावनी जारी की है और बाघों की मूवमेंट वाले इलाकों में जाने से मना किया गया है। फिर भी बीते पांच वर्षों में केवल बांधवगढ़ क्षेत्र में ही 39 से अधिक आदिवासी ऐसे हमलों में मारे जा चुके हैं।

बीते दो महीने की घटनाएं

23 मार्च: उत्तर पलझा बीट में मवेशी चरा रहे एक 50 वर्षीय चरवाहे को बाघिन ने मार डाला।

2 अप्रैल: कोठिया गांव की रानी सिंह महुआ बीनते समय बाघ का शिकार बनी।

12 अप्रैल: 12 वर्षीय विजय, दादा के साथ महुआ बीनते गया था, बाघ उसे जबड़े में दबाकर ले गया।

3 मई (बालाघाट): कुडवा कॉलोनी में खेत में काम कर रहे किसान पर बाघ ने हमला कर दिया।

16 मई: तेंदूपत्ता तोड़ रहे अनिल भलावे को बाघ ने मार डाला।


विजय की कहानी – मौत की परछाईं

12 साल का विजय अपने दादा भगिनी विश्वनाथ के साथ हर दिन महुआ बीनने जाया करता था। उस दिन भी दोनों जंगल गए थे। विजय पेड़ के नीचे फूल बीन रहा था, तभी बाघ ने हमला किया और उसे जबड़े में दबाकर ले गया। बाद में उसका शव एक किलोमीटर दूर नाले में मिला। यह दृश्य न सिर्फ परिवार, बल्कि पूरे गांव के लिए गहरा सदमा बन गया।

वन विभाग की प्रतिक्रिया

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के उप संचालक पी.के. वर्मा कहते हैं, “हम लगातार लोगों को चेताते हैं कि बाघों के मूवमेंट वाले क्षेत्र में न जाएं, खासकर महुआ और तेंदूपत्ता संग्रहण के समय। परंपराएं और जरूरतें लोगों को जोखिम उठाने पर मजबूर कर रही हैं। ऐसे में सामुदायिक जागरूकता के साथ वैकल्पिक उपायों पर भी काम करने की जरूरत है।”

महुआ आदिवासियों के जीवन का अभिन्न हिस्सा है, लेकिन जंगलों में बढ़ती बाघों की मौजूदगी और संघर्ष ने इसे मौत से जोड़ दिया है। यह जरूरी है कि सरकार, वन विभाग और समुदाय मिलकर ऐसी व्यवस्था करें, जिससे परंपरा और सुरक्षा दोनों का संतुलन कायम रह सके।

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