कोरबा/नई दिल्ली। विशेष रिपोर्ट।
कोरबा/नई दिल्ली। Vachannews जब जंगलों पर संकट गहराने लगा, तब छत्तीसगढ़ की धरती से दो कदम आगे बढ़े। ये कदम केवल पैदल नहीं चले, बल्कि अपने साथ लाखों पेड़ों की हरियाली, वन्यजीवों की मौन पुकार और आदिवासी समाज की सदियों पुरानी संस्कृति का संदेश लेकर निकले।

30 जून 2026 को कोरबा (कटघोरा) से शुरू हुई “जल–जंगल–जमीन जन-अधिकार पदयात्रा” आखिरकार 20 जुलाई 2026 को देश की राजधानी नई दिल्ली पहुंच गई। इस ऐतिहासिक यात्रा का नेतृत्व हार्दिक बाजार (सरईसिंगार) निवासी राजकमल यादव और चंद्रशेखर पांडे ने किया।
यह यात्रा किसी राजनीतिक मंच की नहीं, बल्कि प्रकृति, पर्यावरण और भविष्य की रक्षा के लिए उठी जनआवाज़ बनकर सामने आई।
“जंगल सिर्फ लकड़ी नहीं, जीवन की सांस हैं”
पदयात्रा का संदेश साफ था— यदि हसदेव, बस्तर, बैलाडीला और सरगुजा के जंगल सुरक्षित रहेंगे, तभी आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रहेंगी।
यात्रा के दौरान दोनों यात्रियों ने गांव-गांव पहुंचकर लोगों को बताया कि जंगल केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि करोड़ों जीव-जंतुओं का घर, आदिवासी समाज की संस्कृति और धरती का प्राकृतिक संतुलन हैं।

हर कदम के साथ जुड़ता गया जनसमर्थन
21 दिनों की इस पदयात्रा में अनेक गांवों, कस्बों और शहरों से लोगों ने समर्थन दिया। रास्ते भर पर्यावरण संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और जल-जंगल-जमीन पर स्थानीय समुदायों के अधिकार को लेकर संवाद किया गया।
यात्रा का उद्देश्य था कि हसदेव अरण्य सहित छत्तीसगढ़ के जंगलों की आवाज़ सीधे दिल्ली तक पहुंचे और नीति-निर्माताओं का ध्यान इस ओर आकर्षित हो।

संघर्ष नहीं, भविष्य बचाने का संकल्प
राजकमल यादव और चंद्रशेखर पांडे का कहना है कि—
“यह यात्रा किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के पक्ष में है। जंगल बचेंगे तो पानी बचेगा, वन्यजीव बचेंगे, आदिवासी संस्कृति बचेगी और भारत का पर्यावरण सुरक्षित रहेगा।”
कोरबा की धरती से निकली यह पदयात्रा अब केवल दो लोगों की यात्रा नहीं रही, बल्कि छत्तीसगढ़ के जंगलों, वन्यजीवों और आदिवासी अस्मिता की राष्ट्रीय आवाज़ बन चुकी है। 30 जून से 20 जुलाई तक का यह सफर इस बात का प्रतीक है कि जब इरादे मजबूत हों, तो सैकड़ों किलोमीटर की दूरी भी एक संदेश को देश के दिल तक पहुंचाने से नहीं रोक सकती।







