छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का अहम फैसला: झूठे आरोपों में फंसे पिता को किया बरी, दो साल बाद मिली रिहाई

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बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक पिता को दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया है। अदालत ने सबूतों के अभाव और पीड़िता के बयान की अविश्वसनीयता के आधार पर यह फैसला सुनाया। न्यायालय ने माना कि यह मामला झूठे आरोपों का स्पष्ट उदाहरण है, जहां चिकित्सा और फोरेंसिक साक्ष्य अभियोजन पक्ष के दावे को सिद्ध करने में विफल रहे।

क्या है पूरा मामला?

मामला जांजगीर-चांपा जिले का है, जहां 2019 में एक युवती अपने पड़ोस में रहने वाले युवक रितेश के साथ भाग गई थी। इस पर युवती के पिता ने युवक के खिलाफ दुष्कर्म की शिकायत दर्ज करवाई, जिसके बाद पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

रितेश की गिरफ्तारी से उसके परिजन, खासतौर पर उसकी दादी, नाराज थीं। बाद में युवती अपने घर लौट आई। 2022 में एक दिन पिता ने नशे की हालत में खाने को लेकर बेटी से मारपीट की। इस घटना के बाद जब युवती घर से बाहर निकली, तो रितेश की दादी ने उसे धमकी दी कि अगर उसने अपने पिता के खिलाफ मामला दर्ज नहीं कराया, तो इसके गंभीर परिणाम होंगे।

दबाव में आकर पीड़िता ने अपनी अनपढ़ता के कारण पुलिस में दर्ज करवाई गई शिकायत पर अंगूठा लगा दिया। पुलिस ने इस शिकायत को आधार बनाते हुए पिता को गिरफ्तार कर लिया और निचली अदालत ने उन्हें 10 साल कैद की सजा सुनाई।

निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में दी गई चुनौती

पिता ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि मेडिकल रिपोर्ट में दुष्कर्म की पुष्टि नहीं हुई थी और पीड़िता ने पहले ही बयान दिया था कि उसने दबाव में यह आरोप लगाए थे।

न्यायमूर्ति संजय के. अग्रवाल की एकल पीठ ने इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए निचली अदालत के फैसले को पलट दिया और आरोपी पिता को दोषमुक्त करार देते हुए तत्काल रिहाई का आदेश दिया। इस गलत फैसले की वजह से आरोपी को दो साल से अधिक समय जेल में बिताने पड़े।

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