ब्रेकिंग: घरघोड़ा में राख माफिया का बड़ा खेल! मंत्री के दावों की निकली हवा, किसानों की तकदीर पर चला बुलडोज़र

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छत्तीसगढ़/रायगढ़

 

 ‘सफेद सोने’ के नाम पर किसानों को समृद्धि का सपना दिखाने वाली योजना अब घरघोड़ा में काले कारोबार का चेहरा बन चुकी है। जमीनी सच्चाई यह है कि राख (फ्लाई ऐश) के अवैध खेल ने न सिर्फ किसानों की जमीन को नुकसान पहुंचाया है, बल्कि उनके हक और भविष्य पर भी बड़ा खतरा खड़ा कर दिया है।

 

 

 रायगढ़।  सत्ता के गलियारों से निकला ‘आदेश’ जब धरातल की पगडंडियों तक पहुँचता है, तो वह रसूखदारों की चौखट पर दम तोड़ देता है। घरघोड़ा ब्लॉक का नावपारा टेड़ा आज इसका जीता-जागता प्रमाण बन चुका है। यहाँ कानून की धज्जियाँ उड़ रही हैं, NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) के नियम मखौल बन चुके हैं और ‘मॉडल SOP’ के दावे राख के ढेर के नीचे दफन हो गए हैं।

मंत्री जी! आपका ‘मॉडल’ यहाँ ‘धुआं’ हो रहा है – विधानसभा के पटल पर वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने सीना ठोककर जिस ‘मॉडल SOP’ की वकालत की थी, घरघोड़ा के नावपारा में वह पूरी तरह फेल नजर आ रही है। मंत्री जी ने स्पष्ट कहा था कि कृषि और वन भूमि पर राख डालना वर्जित है, लेकिन यहाँ की तस्वीरें मंत्री के दावों को मुँह चिढ़ा रही हैं। क्या स्थानीय प्रशासन ने मंत्री के निर्देशों को रद्दी का टुकड़ा मान लिया है?

 

 राजस्व विभाग का ‘अजब खेल’ : न आँखें काम कर रही हैं, न जमीर!  – इस पूरे खेल में राजस्व अमले की भूमिका किसी शतरंज के खिलाड़ी जैसी है, जहाँ मोहरे गरीब किसान हैं और खिलाड़ी रसूखदार।

नायब तहसीलदार का ‘कागजी’ चश्मा : साहब का तर्क है कि खसरा नंबर 311/4 पर पर्यावरण स्वीकृति के बाद काम हो रहा है। सवाल यह उठता है कि क्या ‘पर्यावरण विभाग’ अब उपजाऊ कृषि भूमि को बंजर रेगिस्तान बनाने का आधिकारिक लाइसेंस बाँट रहा है?

पटवारी की ‘कॉलम’ वाली लाचारी : पटवारी लोकेश पैकरा का बयान तो सिस्टम की बेशर्मी की पराकाष्ठा है। उनका कहना है कि ‘जांच प्रतिवेदन में बगल की खेती का जिक्र करने के लिए कॉलम ही नहीं था’। साहब, अगर फॉर्म में ‘ईमानदारी’ का कॉलम न हो, तो क्या आँखों देखी हकीकत को दफन कर दिया जाएगा?

 

बड़ा सवाल : क्या अब नियमों का पालन सिर्फ फॉर्म के ‘कॉलम’ तय करेंगे? क्या अगल-बगल लहलहाती फसलें अधिकारियों को दिखाई नहीं दे रहीं?

 

 गरीब की थाली पर ‘राख’ का पहरा – एक तरफ सरकार भूमिहीन परिवारों को जमीन देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाने का दम भरती है, वहीं दूसरी ओर ‘ऐश लिफ्टरों’ और उद्योगपतियों की गिद्ध दृष्टि इन गरीब कंधों पर टिकी है। जिस जमीन पर धान की बालियाँ झूमनी चाहिए थीं, वहाँ अब जहरीली फ्लाई ऐश का काला साम्राज्य खड़ा हो रहा है।

 

खतरे में भविष्य : फेफड़ों में जहर, मिट्टी में मौत – यह केवल जमीन कब्जाने का मामला नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता को बीमार करने की साजिश है। उड़ती राख न केवल मिट्टी की उर्वरता मार रही है, बल्कि ग्रामीणों के फेफड़ों में जहर घोल रही है

 

कार्रवाई होगी या ‘मैनेजमेंट’ जीतेगा? – विधानसभा में बड़ी-बड़ी बातें करना आसान है, लेकिन चुनौती धरातल पर रसूखदारों के ‘मैनेजमेंट’ को तोड़ने की है। क्या जिला प्रशासन और जिम्मेदार मंत्री इस ‘फ्लाई ऐश कांड’ पर संज्ञान लेंगे, या फिर रसूखदारों की साठगांठ इसी तरह कानून को ठेंगा दिखाती रहेगी?

 

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