भूमि विवाद से आत्महत्या तक: ‘मग्गू सेठ’ विनोद अग्रवाल समेत 6 की ज़मानत याचिका हाईकोर्ट से खारिज

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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने पहाड़ी कोरवा आदिवासी की आत्महत्या मामले में दिए महत्वपूर्ण निर्देश, साजिश और मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप

राजपुर, बलरामपुर-रामानुजगंज |

“जमीन छीनी, इज्जत छीनी… और अब जान भी” – आत्महत्या से पहले टूटा आदिवासी का मनोबल

छत्तीसगढ़ के सुदूर आदिवासी क्षेत्र में भूमि विवाद के चलते आत्महत्या करने वाले भैराराम केस ने एक बार फिर आदिवासी जमीनों की लूट और शोषण के गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में नामजद 6 आरोपियों—विनोद अग्रवाल उर्फ मग्गू सेठ और उसके साथियों की अग्रिम/नियमित ज़मानत याचिकाएँ छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने खारिज कर दी हैं।

न्यायमूर्ति संजय कुमार जायसवाल की एकल पीठ ने 1 जुलाई 2025 को आदेश पारित करते हुए कहा कि “पुलिस जांच अधूरी है, आरोप प्रथम दृष्टया गंभीर हैं और ज़मानत देना उचित नहीं होगा।”


मामले की पृष्ठभूमि: पुश्तैनी ज़मीन से शुरू हुआ संघर्ष, आत्महत्या तक पहुँचा

पीड़िता जुबारो बाई की पुश्तैनी ज़मीन, जिसे पति भैराराम के साथ साझा खाते में दर्ज किया गया था, को षड्यंत्रपूर्वक शिवराम के नाम पंजीकृत करवा दिया गया। आरोप है कि इसके लिए न तो कोई मुआवज़ा दिया गया, न ही परिवार की सहमति ली गई।

🔹 मुख्य आरोप:

  • ज़मीन की धोखाधड़ी से रजिस्ट्री
  • भैराराम को धमकाकर मानसिक प्रताड़ना
  • आत्महत्या के लिए उकसाना

इस घटनाक्रम से क्षुब्ध होकर भैराराम ने 21-22 अप्रैल 2025 की रात आत्महत्या कर ली।


कानूनी धाराएँ और दर्ज अपराध

प्राथमिकी संख्या 103/2025 में आरोपियों पर निम्नलिखित धाराएँ लागू की गई हैं:

  • IPC 2023 की धारा 108 (उकसाने का अपराध)
  • धारा 3(5) – अनुसूचित जनजाति संरक्षण कानून
  • SC/ST Atrocities Act की धारा 3(2)(v)

पूर्व में 23 अप्रैल को एक अन्य एफआईआर क्रमांक 90/2025 भी दर्ज हो चुकी है जिसमें धोखाधड़ी के अन्य आरोपियों के नाम शामिल हैं।


जिनकी ज़मानत याचिकाएँ खारिज हुईं

  1. विनोद कुमार अग्रवाल (उर्फ मग्गू सेठ)
  2. प्रवीण अग्रवाल
  3. दिलीप टिग्गा
  4. चतुरगुण यादव
  5. राजेन्द्र मिंज
  6. धरमपाल कौशिक

राज्य की ओर से उपसरकार अधिवक्ता सुनीता मणिकपुरी ने याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि “मामले की जांच गंभीर मोड़ पर है, और ज़मानत देने से जांच प्रभावित हो सकती है।”


‘मग्गू सेठ फाइल्स’ — जमीन, जुर्म और जुबानबंदी की पड़ताल शुरू

एपिसोड 1: एक कोरवा की ज़मीन से शुरू हुई कहानी, आत्महत्या की जांच तक पहुँची

बलरामपुर-रामानुजगंज में वर्षों से एक नाम गूंजता रहा — मग्गू सेठ। व्यापारी से भूमाफिया और अब आत्महत्या के मामले में आरोपी तक का सफर किसी फिल्मी किरदार जैसा प्रतीत होता है, लेकिन पीड़ितों के लिए यह डरावनी हकीकत है।

🔍 भाग 1: ज़मीन – धोखे से छीनी विरासत

जुबारो बाई को न तो दस्तावेज़ी प्रक्रिया की जानकारी थी, न ही किसी वकील की मदद मिली। रजिस्ट्री 18 नवंबर 2024 को शिवराम के नाम करवा दी गई — आरोप है कि सब कुछ धोखाधड़ी से हुआ।

🔍 भाग 2: जुर्म – भैराराम को मानसिक प्रताड़ना

“तेरा कुछ नहीं है अब, निकल जा यहां से” जैसे ताने, पीछा करना, बदसलूकी… ये भैराराम की रोज़मर्रा की सच्चाई बन चुके थे। अंततः उनका आत्मसम्मान टूट गया और उन्होंने जीवन को अलविदा कह दिया।

🔍 भाग 3: जुबानबंदी – डर और सत्ता की साँठगाँठ

विनोद अग्रवाल पर पहले से ही 9 आपराधिक मामले दर्ज हैं। फिर भी कोई सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?

एक स्थानीय पत्रकार ने बताया:

“अगर आपने मग्गू सेठ का नाम लिया, तो अगला केस आपके ऊपर भी बन सकता है।”


न्याय की पहली दस्तक बनी एक उम्मीद

हाईकोर्ट का फैसला आदिवासी समाज में न्याय की उम्मीद को मजबूत करता है। अब इस केस की अगली सुनवाई और पुलिस जांच की दिशा पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हैं।


आगे क्या? — “मग्गू सेठ फाइल्स” की अगली कड़ियों में पढ़िए:

🔸 रजिस्ट्री रैकेट: कागज़ कैसे बनते हैं, और कौन बनाता है?
🔸 भरोसे की कब्र: आदिवासी जमीनों पर कब्ज़े का सिस्टम
🔸 खामोश पुलिस, ताक़तवर दलाल: सत्ता का गठजोड़
🔸 कौन अधिकारी और नेता ‘मग्गू सेठ’ के पीछे खड़े हैं?

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