यमन में फांसी की सजा का सामना कर रही भारतीय नर्स निमिषा प्रिया, परिवार की गुहार – “भारत सरकार बचाए हमारी बेटी को”

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केरल की रहने वाली 37 वर्षीय भारतीय नर्स निमिषा प्रिया इस समय यमन की राजधानी सना में मौत की सजा का सामना कर रही हैं। खबर है कि अगले कुछ हफ्तों में उन्हें फांसी दी जा सकती है, जिससे उनका परिवार सदमे में है। उनकी मां प्रेमा कुमारी बेटी की जान बचाने के लिए हर दरवाज़े पर गुहार लगा रही हैं। भारत सरकार से भी अपील की जा रही है कि वह इस बेटी को मौत के मुंह से बाहर निकालने के लिए ठोस कदम उठाए।

क्या है पूरा मामला?

निमिषा साल 2008 में नौकरी के सिलसिले में यमन गई थीं। वहां एक नर्स के तौर पर काम करने के बाद उन्होंने एक स्थानीय व्यक्ति तलाल अब्दो महदी के साथ मिलकर क्लिनिक खोलने का प्रयास किया, क्योंकि यमन के कानून के मुताबिक विदेशी महिलाएं अकेले व्यापार नहीं कर सकतीं। यहीं से उनकी मुसीबतें शुरू हुईं।

निमिषा का आरोप है कि तलाल ने धोखे से खुद को उनके पति के रूप में दर्ज करवा दिया और उसके बाद उनका मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न करने लगा। उसने निमिषा का पासपोर्ट भी जब्त कर लिया और उन्हें बंधक जैसी हालत में रखा। इसी अत्याचार से बाहर निकलने के लिए निमिषा ने कथित तौर पर एक जेल अधिकारी की मदद से तलाल को नींद की गोलियां देकर बेहोश करने की कोशिश की, लेकिन ओवरडोज़ से उसकी मौत हो गई।

कोर्ट का फैसला और मौजूदा हालात

यमन की अदालत ने इसे हत्या करार देते हुए निमिषा को मौत की सजा सुना दी, जिसे 2023 में हूती विद्रोहियों की सर्वोच्च न्यायिक संस्था ने भी बरकरार रखा। अब यह मामला अंतिम चरण में पहुंच गया है और जेल प्रशासन को फांसी की प्रक्रिया शुरू करने का पत्र भी मिल चुका है।

भारत सरकार की कोशिशें और कूटनीतिक चुनौती

भारत सरकार ने संसद में जानकारी दी थी कि निमिषा के परिवार को हरसंभव सहायता दी जा रही है। हालांकि, सबसे बड़ी बाधा यह है कि भारत और हूती विद्रोहियों के बीच कोई औपचारिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। भारत की बात यमन के मान्यता प्राप्त राष्ट्रपति परिषद से होती है, जबकि सना जैसे इलाकों पर हूती नियंत्रण में हैं।

क्या बच सकती है जान? – ब्लड मनी ही आखिरी रास्ता!

यमन के कानून में ब्लड मनी यानी ‘खून के बदले मुआवज़ा’ का प्रावधान है। मृतक के परिवार को आर्थिक मुआवजा देकर आरोपी की जान बचाई जा सकती है। इस दिशा में निमिषा की मां ने यमन जाकर प्रयास किया, लेकिन अब तक मृतक परिवार ने कोई निश्चित रकम नहीं बताई है।

एक मानवाधिकार समूह ने निमिषा की फांसी रोकने के लिए 10 लाख डॉलर (लगभग 8.5 करोड़ रुपये) की पेशकश की है, लेकिन मृतक के परिजन की सहमति अभी तक नहीं मिल सकी है।

क्या आगे कोई उम्मीद है?

मानवाधिकार कार्यकर्ता सैमुएल जेरोम बास्करन लगातार यमन में अधिकारियों और मृतक के परिवार से संपर्क में हैं। लेकिन समय तेजी से बीत रहा है। ऐसे में अब भारत सरकार, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और आम जनता की अपील ही निमिषा की अंतिम उम्मीद बन गई है।

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