आरटीआई कानून का मजाक बना रहे कोरबा जिले के अधिकारी

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भ्रष्ट्राचार उजागर न हो, इसलिए प्रभारी बीईओ ने आवेदक को नहीं दी जानकारी; डीईओ से की शिकायत, अपील के जरिए सूचना की माँग

आवेदक का आरोप – जांच टीम ने किया एकपक्षीय बयान दर्ज, प्रभारी बीईओ ने दी लालच भरी धमकी

कोरबा पोड़ी उपरोड़ा : सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 का मकसद सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाना है, लेकिन कोरबा जिले के जिम्मेदार अधिकारी इस कानून की धज्जियाँ उड़ाते नजर आ रहे हैं। निर्धारित शुल्क के साथ समय पर आवेदन जमा करने के बावजूद आवेदकों को समयसीमा में जानकारी नहीं दी जा रही, जिससे वे मानसिक और आर्थिक पीड़ा झेलने को मजबूर हैं।

जब आवेदक प्रथम अपीलीय अधिकारी के पास अपील करता है, तो वहाँ से भी केवल औपचारिक आदेश पारित किए जाते हैं, लेकिन जानकारी नहीं मिलती। ऐसे में आवेदकों को अंततः राज्य सूचना आयोग या न्यायालय की शरण लेनी पड़ती है, जिससे सूचना मिलने में अत्यधिक विलंब होता है और आरटीआई अधिनियम की मूल भावना पर सवाल उठता है।

आरटीआई कार्यकर्ता विजय (बादल) दुबे ने पोड़ी उपरोड़ा स्थित खंड शिक्षाधिकारी कार्यालय से 08 मई 2024 को सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत 01 जनवरी 2023 से 01 मई 2024 तक प्राप्त समस्त आवेदनों की सत्यापित छायाप्रति मांगी थी। लेकिन जनसूचना अधिकारी द्वारा उन्हें भ्रामक जानकारी दी गई।

इससे असंतुष्ट होकर विजय दुबे ने 15 मई 2024 को जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय में प्रथम अपील दायर की और भ्रामक जानकारी को लेकर शिकायत भी की। अपील की सुनवाई 08 अगस्त 2024 को हुई, और जांच के लिए दो प्राचार्यों की टीम गठित की गई। परंतु, जांच के दौरान आवेदक का बयान नहीं लिया गया, केवल प्रभारी बीईओ का पक्ष दर्ज किया गया और एकपक्षीय रिपोर्ट जिला शिक्षा अधिकारी को सौंप दी गई।

विजय दुबे ने 28 अप्रैल 2025 को एक शिकायती पत्र देकर इस एकतरफा कार्रवाई का विरोध किया और नई जांच टीम गठित कर निष्पक्ष जांच की मांग की। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रभारी बीईओ प्रीति खैरवार ने फर्जी डिग्रीधारी शिक्षाकर्मियों से वसूली की है और इसी कारण उन्होंने आरटीआई में भ्रामक जानकारी दी। साथ ही जांच के दौरान उन्हें लालच व धमकी भी दी गई।

विजय दुबे ने स्पष्ट किया कि वे उक्त जांच प्रक्रिया से पूरी तरह असंतुष्ट हैं और इससे उन्हें मानसिक और शारीरिक कष्ट हुआ है। यदि उन्हें मांगी गई जानकारी नहीं दी गई, तो वे उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाने को मजबूर होंगे।

अब देखना होगा कि शासन-प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेता है या फिर एक और आरटीआई कार्यकर्ता को न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ेगी।

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