कानून के रक्षक ही कटघरे में!”—बेटे के कथित अपहरण को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता राधेश्याम शर्मा ने किया तमनार TI और तहसीलदार पर FiR, पुलिस-प्रशासन पर गंभीर आरोप

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रायगढ़। जिले की कानून व्यवस्था पर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता राधेश्याम शर्मा मंगलवार को अपने समर्थकों के साथ सिटी कोतवाली पहुंचे और अपने बेटे दीपक शर्मा के कथित अपहरण को लेकर पुलिस पर बेहद गंभीर आरोप लगाए। मामला इतना संवेदनशील है कि अब आरोप सीधे तमनार थाना प्रभारी (टीआई) कमला पुसाम और तमनार तहसीलदार तक जा पहुंचा है।

राधेश्याम शर्मा का आरोप है कि उनके बेटे दीपक शर्मा को बिना किसी वैध नोटिस, वारंट या कानूनी प्रक्रिया के पुलिस द्वारा उठाया गया और घंटों तक उसके बारे में परिवार को कोई जानकारी नहीं दी गई। उन्होंने इसे “सीधे-सीधे अपहरण” करार देते हुए कहा कि जब सवाल पूछे गए तो जवाब देने के बजाय उन्हें ही डराने-धमकाने की कोशिश की गई।

सिटी कोतवाली परिसर में मौजूद राधेश्याम शर्मा ने भावुक होते हुए कहा कि “अगर आम आदमी का बेटा सुरक्षित नहीं है, अगर सवाल पूछने की सजा उठाए जाने में बदल दी जाती है, तो फिर लोकतंत्र और कानून का मतलब ही क्या रह जाता है?” उनके साथ पहुंचे सामाजिक कार्यकर्ताओं और नागरिकों ने भी पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी जाहिर की और निष्पक्ष जांच की मांग की।

सूत्रों के मुताबिक, राधेश्याम शर्मा की शिकायत पर सिटी कोतवाली में तमनार टीआई कमला पुसाम और तमनार तहसीलदार के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है। शिकायत में अधिकारों के दुरुपयोग, अवैध हिरासत और मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। यह एफआईआर ऐसे समय में दर्ज हुई है जब जिले में पहले से ही पुलिस की भूमिका को लेकर बहस और असंतोष का माहौल बना हुआ है।

कोतवाली परिसर में कुछ देर तक तनाव का माहौल रहा। समर्थकों ने नारेबाजी करते हुए कहा कि यह लड़ाई सिर्फ एक पिता के बेटे की नहीं, बल्कि हर उस नागरिक की है जो सत्ता और वर्दी के दुरुपयोग के खिलाफ आवाज उठाना चाहता है। वहीं, पुलिस अधिकारी स्थिति को संभालते नजर आए और मामले में नियमानुसार कार्रवाई का आश्वासन दिया।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रशासन आलोचना और असहमति को दबाने के लिए शक्ति का इस्तेमाल कर रहा है, या फिर यह महज एक गलतफहमी है जिसकी सच्चाई जांच के बाद सामने आएगी। फिलहाल, सबकी नजरें इस एफआईआर और उस पर होने वाली कार्रवाई पर टिकी हैं—क्योंकि यही तय करेगी कि कानून सच में अंधा है या किसी खास दिशा में देखने का आदी होता जा रहा है

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