विलुप्ति की कगार पर हरेली और नागपंचमी: लोक संस्कृति की गूंज पड़ रही धीमी

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Vachannews । विशेष रिपोर्ट।

 

 

 

छत्तीसगढ़। सावन की फुहार के साथ छत्तीसगढ़ की माटी में उमंग और उत्साह भरने वाले हरेली तिहार और नागपंचमी अब धीरे-धीरे अपनी पुरानी पहचान खोते नजर आ रहे हैं। कभी इन लोकपर्वों के अवसर पर गांव-गांव नारियल फेंक प्रतियोगिता, गेड़ी दौड़, नगमत के लोकगीत और पारंपरिक पूजा-अनुष्ठानों की गूंज सुनाई देती थी। आज आधुनिक जीवनशैली और डिजिटल दुनिया के बढ़ते प्रभाव के बीच इन परंपराओं का स्वर लगातार धीमा होता जा रहा है।

कृषि औजारों की पूजा तक सिमटता हरेली

हरेली को छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोकपर्वों में माना जाता है। यह पर्व किसानों और प्रकृति के बीच गहरे रिश्ते का प्रतीक है। परंपरा के अनुसार किसान अपने हल, कुदाल, फावड़ा, गेती सहित कृषि उपकरणों की साफ-सफाई कर उनकी पूजा करते हैं। घरों में चिला, खुरमी, ठेठरी जैसे पारंपरिक पकवान बनाए जाते हैं।

लेकिन कभी हरेली की पहचान रहे गेड़ी दौड़ और नारियल फेंक प्रतियोगिताएं अब गांवों में विरले ही दिखाई देती हैं। जिन चौक-चौराहों पर बच्चों की गेड़ी और युवाओं की प्रतियोगिताओं से उत्सव का माहौल बनता था, वहां अब मोबाइल और सोशल मीडिया ने अपनी जगह बना ली है।

नागपंचमी में भी घट रही लोक परंपराओं की चमक

सावन में मनाई जाने वाली नागपंचमी भी छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे कई जगह ‘नागमत’ के नाम से जाना जाता है। मान्यता और लोक परंपरा के अनुसार घरों की दीवारों और मुख्य द्वार पर गोबर व गेरू से नाग की आकृति बनाई जाती थी और विधि-विधान से पूजा की जाती थी।

कभी नागपंचमी की रात नगमत के पारंपरिक लोकगीतों से गांव गूंजते थे। सपेरे बीन बजाते हुए घर-घर पहुंचते थे और नागदेवता के प्रति श्रद्धा का वातावरण बनता था। अब यह परंपरा भी काफी सीमित होती जा रही है। कई घरों में केवल मुख्य द्वार पर गोबर का नाग बनाकर पूजा की औपचारिकता पूरी कर दी जाती है।

मोबाइल और रीलों ने बदली त्योहारों की तस्वीर

गांव के बुजुर्गों का कहना है कि संयुक्त परिवारों के टूटने और सामूहिक आयोजनों की परंपरा कमजोर होने से लोकपर्वों का रंग फीका पड़ा है। पहले बच्चे गेड़ी बनाकर दौड़ते थे, युवा प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे और महिलाएं पारंपरिक गीत गाती थीं। अब बच्चों का अधिक समय मोबाइल गेम और युवाओं का समय सोशल मीडिया रीलों में बीत रहा है।

बुजुर्गों की चिंता है कि यदि नई पीढ़ी को इन पर्वों के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्व से नहीं जोड़ा गया तो आने वाले समय में हरेली केवल एक छुट्टी और नागपंचमी केवल गोबर से बने नाग की पूजा तक सीमित होकर रह जाएगी।

स्कूलों और पंचायतों में हो पारंपरिक आयोजनों की पहल

लोक संस्कृति से जुड़े लोगों का मानना है कि हरेली और नागपंचमी को केवल धार्मिक या पारंपरिक आयोजन मानने के बजाय छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के रूप में संरक्षित किया जाना चाहिए।

इसके लिए पंचायत स्तर पर हरेली के अवसर पर गेड़ी दौड़ और नारियल फेंक प्रतियोगिता आयोजित की जा सकती है। वहीं नागपंचमी पर नगमत मंडलियों और लोक कलाकारों को मंच देकर पारंपरिक गीत-संगीत को प्रोत्साहित किया जा सकता है। स्कूलों में भी छत्तीसगढ़ के लोकपर्वों, लोकगीतों और पारंपरिक खेलों के बारे में बच्चों को जानकारी दी जानी चाहिए।

हरेली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि किसान और प्रकृति के रिश्ते का उत्सव है। वहीं नागपंचमी मनुष्य और जीव-जंतुओं के सह-अस्तित्व का संदेश देती है।

यदि समय रहते इन पर्वों से जुड़ी परंपराओं, खेलों और लोकगीतों को सहेजने की पहल नहीं हुई, तो आने वाली पीढ़ियां इन त्योहारों को केवल किताबों और तस्वीरों में ही देख पाएंगी।

क्योंकि किसी भी समाज की संस्कृति तब तक जीवित रहती है, जब तक उसके लोकपर्व, लोकगीत और परंपराएं जीवित रहती हैं।

 

 

 

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