पाली जनपद सीईओ ने नियमों को किया दरकिनार, आरोपित संविदा कर्मी को सौंपी 15वें वित्त आयोग की जिम्मेदारी

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बिना कार्ययोजना बंट रही विकास राशि, पंचायतों में व्याप्त है भारी भ्रष्टाचार, जिला प्रशासन मौन

पाली जनपद सीईओ की मनमानी फिर आई सवालों के घेरे में
पाली जनपद पंचायत के चर्चित सीईओ भूपेंद्र सोनवानी एक बार फिर अपनी कार्यशैली को लेकर विवादों में हैं। पहले पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय में कटौती, चुनावी और आयोजन संबंधी खर्च की जबरन उगाही, विकास कार्यों में तकनीकी स्वीकृति के बदले कमीशनखोरी जैसे गंभीर आरोपों के बावजूद उनके रवैये में कोई बदलाव नहीं आया है।

आरोपित संविदा कर्मी को सौंपी गई जिम्मेदारी, नियमों की खुली अवहेलना
विश्वसनीय सूत्रों के मुताबिक, जनपद सीईओ ने बिहान योजना में पदस्थ संविदा कर्मी सत्यप्रकाश जायसवाल को नियमों को दरकिनार करते हुए 15वें वित्त आयोग की जिम्मेदारी सौंप दी है। जबकि यह जिम्मेदारी केवल नियमित कर्मचारियों को दी जानी चाहिए थी। सत्यप्रकाश पर पहले से ही मानसिक उत्पीड़न, फर्जीवाड़ा और महिला कर्मियों पर दबाव डालने जैसे गंभीर आरोप हैं, जिनकी शिकायतें कलेक्टर तक पहुंच चुकी हैं। फिर भी उन पर न कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदारियां छीनी गईं।

बिना कार्ययोजना के पंचायतों को दी जा रही राशि, खुला भ्रष्टाचार
सूत्रों का कहना है कि 15वें वित्त आयोग के तहत पंचायतों को दी जाने वाली राशि बगैर किसी विधिवत कार्ययोजना के मनमाने ढंग से वितरित की जा रही है। नियमों के अनुसार, ग्राम पंचायतों को पहले ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) तैयार करनी होती है, जिसे ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज कर अनुमोदन के बाद ही राशि का आवंटन किया जाता है। लेकिन यहां पर भारी कमीशन लेकर इस प्रक्रिया को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया है।

15वें वित्त की राशि बनी भ्रष्टाचार का जरिया
यह राशि, जो पेयजल, स्वच्छता, बिजली, सड़कों और अन्य बुनियादी विकास कार्यों के लिए पंचायतों को दी जाती है, अब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रही है। बिना कार्ययोजना राशि देने से यह सुनिश्चित नहीं हो पा रहा कि उसका उपयोग सही जगह और उद्देश्य के लिए हो रहा है या नहीं। यह न केवल शासन की योजनाओं की साख पर सवाल खड़े करता है, बल्कि ग्रामीण विकास के प्रयासों को भी नुकसान पहुंचाता है।

जिला प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
पाली जनपद में लंबे समय से अनियमितताओं और मनमानी का दौर चल रहा है। अधिकारी बेलगाम हैं और नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ऐसे में जिला प्रशासन की निष्क्रियता भी गंभीर चिंता का विषय है। अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन ऐसे अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई करेगा या यह भ्रष्ट व्यवस्था यूं ही चलती रहेगी?

पाली जनपद में जिस प्रकार संविदा कर्मियों को नियमों के विरुद्ध वित्तीय जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं और भारी-भरकम कमीशन के बदले बगैर योजना के राशि वितरित की जा रही है, वह न केवल भ्रष्टाचार का उदाहरण है, बल्कि ग्रामीण विकास को भी गहरे संकट में डाल रहा है। अब ज़रूरत है कि जिला प्रशासन तत्काल हस्तक्षेप कर इस गड़बड़ी पर लगाम लगाए।

 

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