अंबिकापुर/सरगुजा। विशेष रिपोर्ट।
अंबिकापुर। सरगुजा अंचल की समृद्ध लोकसंस्कृति, मिट्टी की खुशबू और पारंपरिक लोकगीतों को सहेजने एवं नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से निरंतर सरगुजा द्वारा आयोजित लोकगीत कार्यक्रम ‘लोकरंजनी’ का भव्य आयोजन होटल अलंकार ग्रीन में किया गया। कार्यक्रम में सरगुजा अंचल के लोकप्रिय पारंपरिक गीतों की ऐसी मधुर प्रस्तुतियां हुईं कि पूरा वातावरण लोकसंगीत की सुरमयी छटा से सराबोर हो गया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ. पुष्पा सोनी, श्रीमती संतोष पाण्डेय, डॉ. अपेक्षा सिंह, रंजय स्वर्णकार, रश्मि स्वर्णकार, वरिष्ठ समाजसेवी मंगल पाण्डेय एवं वरिष्ठ कलाकार रासबिहारी मिश्रा द्वारा मां सरस्वती एवं भगवान गणपति के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया गया।
कार्यक्रम में मीना वर्मा ने उपस्थित अतिथियों एवं संगीत प्रेमियों का अभिनंदन किया। इसके बाद निरंतर की संस्थापिका वंदना दत्ता ने अतिथियों का स्वागत किया तथा उन्हें स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया।

सरगुजा की मिट्टी की महक से जुड़ी हैं ये रचनाएं
कार्यक्रम की शुरुआत में वंदना दत्ता ने ‘लोकरंजनी’ के उद्देश्य और प्रस्तुत किए जाने वाले गीतों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम में प्रस्तुत किए गए अनेक गीत आकाशवाणी अम्बिकापुर से प्रसारित लोकप्रिय रचनाएं हैं। इन गीतों में सरगुजा के प्रसिद्ध गीतकार स्व. रामप्यारे रसिक एवं स्व. अनिरुद्ध नीरव की यादगार रचनाएं शामिल हैं, जिनमें सरगुजा की माटी की सुगंध, लोकजीवन और संस्कृति की स्पष्ट झलक दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि इन रचनाओं में श्रृंगार रस सहित विभिन्न भावों को बेहद सुंदर एवं सहज शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है और इनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें लोकभावना के साथ मर्यादा भी कायम रहती है।
कार्यक्रम में संगीत के क्षेत्र में योगदान देने वाले स्व. दिलीप सक्सेना, पारंपरिक गीतों के गुरु स्व. प्रवीण प्रजापति, स्व. राजेन्द्र गुप्ता एवं आकाशवाणी के उद्घोषक श्री शैलेन्द्र योगी को भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया।
‘मैं वंदत हो दिनरात’ से हुई सुरमयी शुरुआत
लोकसंगीत की प्रस्तुतियों का सिलसिला लक्ष्मण मस्तुरिया की प्रसिद्ध रचना ‘मैं वंदत हो दिनरात’ से हुआ। वरिष्ठ कलाकार रासबिहारी मिश्रा एवं उनके साथियों ने छत्तीसगढ़ वंदना के रूप में इसकी मधुर प्रस्तुति दी।
इसके बाद अनिरुद्ध नीरव की रचना ‘सरगुजा के भुइयां कर माया महतारी असन, चल संगी हाय रे’ को वंदना दत्ता एवं साथियों ने प्रस्तुत किया। उद्घोषिका अर्चना दीक्षित ने अपनी प्रभावी शैली में कलाकारों को मंच पर आमंत्रित करते हुए कार्यक्रम का सफल संचालन किया।
मीना वर्मा ने अपनी रचना ‘सरगुजा जिला भारी’ एवं ‘चल संगी खेले जबो’ की प्रस्तुति देकर दर्शकों की खूब वाहवाही बटोरी। वहीं मोहर लाल राही एवं वंदना दत्ता ने स्व. रामप्यारे रसिक की रचना ‘तोला देखे बिना संगी टपकी-टपकी चुवे लोर’ प्रस्तुत की, जिस पर दर्शकों ने जमकर तालियां बजाईं।

पंडवानी, भरथरी और कर्मा गीतों ने बढ़ाया रंग
कार्यक्रम में प्रेमानंद पातर ने भी स्व. रामप्यारे रसिक की रचना प्रस्तुत की। अतिथि डॉ. पुष्पा सोनी के आग्रह पर उन्होंने छत्तीसगढ़ी गीत ‘नरवा तीर में मोर’ की मधुर प्रस्तुति दी।
लोकगायिका बबिता विश्वास ने पंडवानी एवं भरथरी की प्रस्तुति के साथ ‘घोड़ा रोये घोड़साल मा’ सुनाकर लोकसंगीत की विविधता को मंच पर जीवंत कर दिया। इसके बाद उनके द्वारा प्रस्तुत कर्मा गीत ‘रिमझिम भादो के बरसात में चला कर्मा खेले जाई’ ने माहौल को और भी जीवंत बना दिया। गीत की धुन पर दर्शक स्वयं कर्मा नृत्य करने लगे और पूरा सभागार तालियों एवं उत्साह से गूंज उठा।
वंदना दत्ता ने स्व. प्रवीण प्रजापति की रचनाओं ‘पानी मारे दलेला उठाये लेबे बाबू ते बड़खा बुंदेला’ एवं ‘रात झिम-झिम करे’ की प्रस्तुति दी। मोहर लाल राही ने भी एकल कर्मा गीत प्रस्तुत कर दर्शकों का मन मोह लिया।
गीतों के साथ दर्शकों ने भी गुनगुनाए सुर
वरिष्ठ कलाकार रासबिहारी मिश्रा ने रसिक जी की रचना ‘सतरंगी करौंदा’ प्रस्तुत की। इसके बाद अनिरुद्ध नीरव की रचना ‘पियर-पियर गांव तोला हंकाये रे’ और रसिक जी की लोकप्रिय रचना ‘पैरी के रुनझुन, खोपा कर गोंदा फूल’ का सामूहिक गायन हुआ।
इन प्रस्तुतियों की खासियत यह रही कि कलाकारों के साथ दर्शक भी गीतों को गुनगुनाते नजर आए। कार्यक्रम ने न केवल मनोरंजन किया, बल्कि सरगुजा की लोकपरंपरा, बोली, संस्कृति और संगीत विरासत से लोगों को फिर से जोड़ने का काम किया।
वरिष्ठ कलाकारों एवं सहयोगियों का किया गया सम्मान
कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ कलाकार रासबिहारी मिश्रा, मीना वर्मा, मोहर लाल राही, उद्घोषिका अर्चना दीक्षित, प्रेमानंद पातर सहित संगीत में सहयोग देने वाले प्रदीप विश्वास, इस्लाम खान, पेड़ वादक एवं सहगायिका सुप्रिया वर्मा का अभिनंदन करते हुए स्मृति चिन्ह प्रदान किए गए।
‘लोकरंजनी’ के आयोजन को सफल बनाने में लेजर हॉस्पिटल की डॉ. अपेक्षा गहरवार, शास्त्री मोटर्स के श्री सतीश चंद्र मिश्रा, श्री रंजय स्वर्णकार एवं डॉ. शांतनु सोनी (COS BOS) का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
लोकसंस्कृति के संरक्षण के लिए ऐसे आयोजन जरूरी
कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों ने अपने संबोधन में कहा कि सरगुजा की लोकसंस्कृति और पारंपरिक गीत हमारी पहचान और सांस्कृतिक विरासत हैं। ऐसी प्रस्तुतियों के माध्यम से पुरानी पीढ़ी की संगीत परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया जा रहा है। अतिथियों ने ‘लोकरंजनी’ जैसे आयोजन समय-समय पर निरंतर आयोजित किए जाने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कार्यक्रम में विजय गुप्त, गुलाब अग्रवाल, राजेश पाण्डेय अब्र, कृष्णानंद तिवारी, देवेन्द्र दास सोनवानी, अशोक जायसवाल, जयेश वर्मा, रंजन खेर पाण्डेय, पंकज मुंजे, अजय तिवारी, पद्मनाभन शर्मा, अनंगपाल दीक्षित, असीम सेनगुप्ता, एम.एस. चौदहा, डॉ. तृप्ति विश्वास, दीपमाला सिंह, हेना सेन, किरण गुप्ता, नेहा वर्मा, सोनी सिन्हा, रेखा इंगोले, पूनम जायसवाल, अलका इंगोले, चेतना मुंजे, अंजना परिहार, मंजू जायसवाल, जानकी सिंह, तनुश्री मिश्रा, सुधा तिवारी, मिलन शर्मा, मधु चौदहा, अनिता शुक्ला, साधना कश्यप, संगीता महापात्र, जयंती सहित बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी एवं सुधिजन उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में मीना वर्मा एवं समूह ने ‘मोला जवान दे न अलबेला, मोर अबड़ बेला होंगे’ की प्रस्तुति के साथ सभी अतिथियों, कलाकारों एवं दर्शकों के प्रति आभार व्यक्त किया। इसी के साथ सरगुजा की लोकधुनों से सजा यह यादगार कार्यक्रम मधुर स्मृतियों के साथ संपन्न हुआ।









